
रिपोर्ट सत्येन्द्र यादव

कुल्टी सोलह दिवसीय गणगौर का त्यौहार शनिवार को बराकर नदी तट पर मूर्ति विसर्जन के साथ संपन्न हुआ।

इस संबंध में बताया जाता हैं राजस्थान का लोकपव॔ गणगौर सुहागिन नव विवाहिता और कुंवारी कन्या द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता हैं। होलिका दहन के साथ शुरू होने वाला यह त्योहार पिता के घर खुशियां लेकर आता है। नवविवाहित पहली गणगौर पिता के घर पर ही पूजती हैं। मां गोरी ही गणगौर के रूप में हैं और भगवान शिव ईशर के रूप में पूजे जाते है। सौलह दिनों तक गौरा और इशर की हरी दुब और कुंआ के जल से पूजा की जाती हैं। बाजरा के आटा की पंजिरी चना एंव गेहू की घुघरी का प्रसाद का भोग लगाया जाता हैं उस प्रसाद का वितरण परिजन और सहेलियों के बीच वितरण किया जाता हैं। पूजा-पाठ के दौरान नवविवाहिता अमर सुहाग का वरदान मांगती है और कुंवारी कन्या सुयोग्य वर का वरदान मांगती हैं। घर में सौलह दिनों तक चहल पहल रहती हैं। गौरा और गौरी की शाम को कहानी सुंनी जाती हैं। घर में पूजा-पाठ के दौरान राजस्थान के धार्मिक लोकगीत सुनाए जाते हैं।
पूजा के दौरान घर में ख़ुशनुमा माहौल रहते हैं और विभिन्न प्रकार के पकवान बनते है।
मूर्ति विसर्जन के दौरान उपवास रखा जाता हैं और गणगौर की कहानी सुनने के बाद भोग का प्रसाद ग्रहण करती हैं। गणगौर की विदाई होने के एक दो दिन के बाद नवविवाहिता की भी विदाई हो जाती हैं।
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