
चांडिल/नीमडीह: झारखंड में जहाँ एक ओर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह थाना क्षेत्र से आदिम जनजाति की बदहाली की ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था को झकझोर कर रख देगी। दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की तराई में बसे लुपुंगडीह टोला (आगोई डांगरा) के पाँच सवर परिवार आज भी आदिम युग जैसी जीवनशैली जीने को मजबूर हैं।

जिंदगी का कड़वा सच:

यहाँ रहने वाले आदिम जनजाति समुदाय के लोग शुद्ध पेयजल के लिए तरस रहे हैं। मजबूरन वे जंगल के झरने का असुरक्षित पानी पीते हैं और भोजन के नाम पर जंगल से चुने गए कंदमूल, फल और फूल पर निर्भर हैं। गरीबी का आलम यह है कि बच्चों के पास पहनने को कपड़े तक नहीं हैं; वे कड़ाके की ठंड और गर्मी में नंगे बदन रहने और जमीन पर सोने को विवश हैं।
जीविका का साधन मात्र ‘बांस’:
इन परिवारों की जीविका पूरी तरह जंगल पर टिकी है। ग्रामीण जंगल से बांस लाकर झाड़ू बनाते हैं। बुधनी सवर जैसी महिलाएं दिन भर मेहनत कर झाड़ू तैयार करती हैं और उन्हें हाट-बाजारों में बेचकर दो जून की रोटी जुटाने की कोशिश करती हैं। लेकिन कभी-कभी बाजार में सही दाम न मिलने के कारण पूरे परिवार को भूखा पेट सोना पड़ता है।
योजनाओं से कोसों दूर:
हैरानी की बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा आदिम जनजातियों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही विशेष योजनाएं इन तक नहीं पहुँच पाई हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं यहाँ सपना मात्र हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार की अनदेखी के कारण उनका समुदाय धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है।
जांच की दरकार:
राज्य सरकार और जिला प्रशासन के लिए यह गंभीर जांच का विषय है कि आखिर क्यों इन परिवारों तक ‘अबुआ आवास’ या अन्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुँचा? अगर समय रहते सुध नहीं ली गई, तो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध यह आदिम जनजाति इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।
बाइट (Quotes)
बुधनी सवर (स्थानीय महिला): “हम जंगल से बांस लाते हैं और झाड़ू बनाकर बेचते हैं। कभी पेट भरता है, कभी नहीं। झरने का पानी पीते हैं। हमारे बच्चों के पास कपड़े नहीं हैं, हम सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं।”
पुरुष सवर (स्थानीय ग्रामीण): “बांस और कंदमूल ही हमारा सहारा है। कोई अधिकारी यहाँ देखने नहीं आता कि हम कैसे जी रहे हैं। न पढ़ाई है, न इलाज की सुविधा।”
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