
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में न्याय, समानता और अच्छे विवेक के सिद्धांतों को लागू करते हुए यह व्यवस्था दी है कि आदिवासी महिलाएं या उनके कानूनी उत्तराधिकारी पैतृक संपत्ति में समान हिस्से के हकदार होंगे. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने गुरुवार (17 जुलाई 2025) को यह फैसला सुनाया, जिसमें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और निचली अदालत के फैसलों को खारिज कर दिया गया.
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला उत्तराधिकारी को संपत्ति में अधिकार से वंचित करना लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देता है, जिसे कानून द्वारा समाप्त किया जाना चाहिए. कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15(1) (भेदभाव पर रोक) का हवाला दिया. पीठ ने कहा कि ये अनुच्छेद संविधान के सामूहिक लोकाचार की ओर इशारा करते हैं, जो महिलाओं के साथ किसी भी भेदभाव को सुनिश्चित करते हैं.

यह फैसला एक अनुसूचित जनजाति की महिला के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा दायर अपील पर आया है, जिन्होंने अपने नाना की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग की थी. हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने हिंदू महिलाओं को संयुक्त परिवार की संपत्ति में सह-उत्तराधिकारी बनाया, लेकिन यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर तब तक लागू नहीं होता जब तक कि सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिसूचित न किया जाए. इसी प्रावधान के कारण अक्सर आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति से वंचित कर दिया जाता था.

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पुरुषों को ही संपत्ति का उत्तराधिकार देना और महिलाओं को नहीं, इसके लिए कोई तर्कसंगत संबंध या उचित वर्गीकरण नहीं है. पीठ ने कहा कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि यह महिलाओं को उनके समानता के अधिकार से वंचित करता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की तरह, रीति-रिवाज भी समय की पाबंदी में नहीं बंधे रह सकते हैं और उन्हें दूसरों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
इस ऐतिहासिक निर्णय से आदिवासी महिलाओं को अपनी पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिल सकेगा, जिससे उन्हें समाज में अधिक सशक्तिकरण और समानता प्राप्त होगी.
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