• Wed. Oct 21st, 2026

सरायकेला : 44 साल बाद भी शहीद अजित-धनंजय के परिजनों को पेंशन-नौकरी का इंतजार, सरकारी शहीद का दर्जा तक नहीं ।

admin's avatar

Byadmin

Oct 21, 2026
crescent ad

 

 

सरायकेला : तिरुलडीह गोलीकांड के 44वें शहादत दिवस पर उमड़ी भीड़, शहीद स्थल पर नेताओं ने दी श्रद्धांजलि, परिजनों से मिलकर जताई संवेदना, फूलों से सजा शहीद वेदी, मेले जैसा माहौल

 

 

झारखंड आंदोलन के इतिहास में दर्ज तिरुलडीह गोलीकांड के शहीद अजित महतो और धनंजय महतो का बलिदान आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। बुधवार को दोनों शहीदों के 44वें शहादत दिवस पर तिरुलडीह स्थित शहीद स्थल पर लोगों की भीड़ उमड़ी।

 

विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने शहीद वेदी पर माल्यार्पण कर दोनों वीर सपूतों को नमन किया।

 

श्रद्धांजलि देने वालों में विधायक सविता महतो, जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो, सुनील महतो जनसेवा ही लक्ष्य के संस्थापक एवं भाजपा नेता हरेलाल महतो, भाजपा नेता सह समाजसेवी खगेन महतो, JLKM केंद्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्रनाथ महतो, केंद्रीय सचिव गोपेश महतो तथा आजसू नेता भोलानाथ महतो समेत कई लोग शामिल रहे।

 

इस दौरान शहीद अजित महतो के पैतृक गांव कुरली पहुंचकर लोगों ने उनके परिजनों से मुलाकात कर श्रद्धासुमन अर्पित किये। वहीं शहीद धनंजय महतो के पैतृक गांव चोगा-आदरडीह में भी लोगों ने श्रद्धांजलि दी और शहीद की पत्नी और पुत्र से मिलकर उनके बलिदान को याद किया।

 

*फूलों से सजा शहीद स्थल, मेले जैसा माहौल -*

शहादत दिवस को लेकर तिरुलडीह स्थित शहीद स्थल को फूलों से सजाया गया था। सुबह से ही श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। शहीद स्थल परिसर में मेले जैसा माहौल देखने को मिला। दोपहर बाद आयोजित कार्यक्रमों में तिरुलडीह गोलीकांड के दौरान आंदोलन में शामिल रहे लोगों और उनके परिजनों को सम्मानित किया गया।

 

*44 साल बाद भी सरकारी सहायता का इंतजार -*

44 वर्ष बीत जाने के बावजूद शहीदों के परिजनों को अपेक्षित सरकारी सहायता नहीं मिली है। जानकारी के अनुसार दोनों शहीदों को अब तक सरकारी स्तर पर शहीद का दर्जा नहीं मिला है। उनके परिजनों को पेंशन और परिवार के सदस्यों को सरकारी नौकरी का लाभ भी नहीं मिल पाया है।

 

हर साल शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन परिवारों की समस्याएं जस की तस हैं। ऐसे में शहीदों को सरकारी सम्मान, परिजनों को पेंशन और योग्य सदस्यों को नौकरी देने की मांग एक बार फिर उठी है। सवाल है कि झारखंड आंदोलन में सर्वोच्च बलिदान देने वाले इन शहीदों के परिवारों को आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा।


There is no ads to display, Please add some
Post Disclaimer

स्पष्टीकरण : यह अंतर्कथा पोर्टल की ऑटोमेटेड न्यूज़ फीड है और इसे अंतर्कथा डॉट कॉम की टीम ने सम्पादित नहीं किया है
Disclaimer :- This is an automated news feed of Antarkatha News Portal. It has not been edited by the Team of Antarkatha.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *