
इन्हें शहीदों का सरताज कहा जाता है। गुरु अर्जन देव साहिब शिरोमणि, सर्वधर्म समभाव के प्रखर पैरोकार होने के साथ-साथ मानवीय आदर्शों को कायम रखने के लिए आत्म बलिदान करने वाले एक महान आत्मा थे।*

*1606 के बाद से 16 जून को सिखों द्वारा उनका शहीदी दिवस मनाया जाता है।*

*जीवन परिचय*
गुरु अर्जन देव का जन्म सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदासजी व माता भानीजी के घर वैशाख वदी 7, (संवत 1620 में 15 अप्रैल 1563) को अमृतसर में हुआ था। गुरु अर्जन देव चौथे गुरु रामदास के तीन पुत्रों में सबसे छोटे थे।
*कैसे बने सिख धर्म के पांचवें गुरु*
गुरु अर्जन देव जी की निर्मल प्रवृत्ति, सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठता तथा धार्मिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण भावना को देखते हुए गुरु रामदासजी ने 1581 में पांचवें गुरु के रूप में उन्हें गुरु गद्दी पर सुशोभित किया।
*समाज सुधारक के रुप में भी जाने जाते हैं गुरु अर्जन देव जी*
पवित्र वचनों से दुनिया को उपदेश देने वाले गुरुजी का मात्र 43 वर्ष का जीवनकाल अत्यंत प्रेरणादायी रहा। वे आध्यात्मिक चिंतक एवं उपदेशक के साथ ही समाज सुधारक भी थे। अपने जीवन काल में गुरुजी ने धर्म के नाम पर आडंबरों और अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया। सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी वे डंटकर खड़े रहे। गुरु अर्जन देव जी ने ‘तेरा कीआ मीठा लागे, हरि नाम पदारथ नानक मागे’ शब्द का उच्चारण करते हुए सन् 1606 में अमर शहीदी प्राप्त की।
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