

सुलोचना लाटकर एक ऐसी अदाकारा, जिसने बाल कलाकार की हैसियत से अपना फिल्मी सफर शुरू किया और फिर लीड एक्ट्रेस और कैरेक्टर रोल्स में खूब नाम कमाया। बीते दौर के हिंदी सिनेमा के तमाम सुपस्टार्स जैसे दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, देवानंद की मां के किरदारों में ये नज़र आ चुकी हैं। सात दशकों तक इन्होंने भारतीय सिनेमा को अपनी कला से रोशन किया है। मराठी हो, हिंदी हो या दक्षिण भारतीय फिल्में हों। सुलोचना लाटकर ने अपने हुनर का डंका हर तरफ बजाया।
*ऐसे हुई सिनेमा में दिलचस्पी*

सुलोचना के गांव में राजेबक्सर की दरगाह और बालेसाब की दरगाह थी। ये दरगाहें उस इलाके में मशहूर थी। इन दरगाहों पर हर साल उर्स का आयोजन होता था और इस दौरान गांव में एक मेला भी लगता था। उस मेले में तमाशा होता था। नाटक किए जाते थे और फिल्मों के शोज़ भी दिखाए जाते थे। नन्ही सुलोचना हमेशा सबसे आगे बैठकर ये सभी प्रोग्राम्स देखा करती थी। छोटी उम्र से ही फिल्मों के प्रति इनके मन में काफी उत्सुकता पैदा होने लगी थी। चलचित्र देखकर ये अक्सर परदे के पीछे जाती थी। ये जानने कि आखिर इस परदे के पीछे है कौन?

साल 1959 की बात है। मशहूर फिल्ममेकर बिमल रॉय ने अपनी फिल्म “सुजाता” में सुलोचना लाटकर को मां का रोल ऑफर किया। सुलोचना ने उन्हें मना तो नहीं किया। लेकिन वो इस दुविधा में ज़रूर फंस गई कि महज़ 30 साल की उम्र में मां के किरदार निभाना कहां तक सही होगा? लेकिन उसी दौर की मशहूर अभिनेत्रियों, दुर्गा खोटे और ललिता पवार, जो कि इनकी बढ़िया दोस्त भी थी, उन्होंने इन्हें सलाह दी कि फिल्म इंडस्ट्री में लंबी पारी खेलनी है तो ये रोल स्वीकार कर लो और उनके कहने पर सुलोचना जी ने बिमल रॉय का वो ऑफर स्वीकार कर लिया।
“सुजाता” बहुत बड़ी हिट साबित हुई और देखते ही देखते सुलोचना लाटकर हिंदी सिनेमा के कैरेक्टर आर्टिस्टों का एक बहुत बड़ा और बिज़ी नाम बन गई।
*सुजाता की प्रमुख फिल्में*
सुजाता के बाद सुलोचना लाटकर ने ‘दिल देके देखो’ (1959), ‘आई मिलन की बेला’ (1964), ‘आए दिन बहार के’ (1966), ‘नई रोशनी’ (1967), ‘संघर्ष’ (1968), ‘दुनिया’ (1968), ‘आदमी’ (1968), ‘साजन’ (1969), ‘जॉनी मेरा नाम’ (1970), ‘कटी पतंग’ (1970), ‘कसौटी’ (1974), ‘प्रेम नगर’ (1974), ‘कोरा कागज़’ (1974), ‘सन्यासी’ (1975), ‘गंगा की सौगंध’ (1978), ‘मुकद्दर का सिकंदर’ (1978), ‘क्रांति’ (1981) और ‘अंधा कानून’ (1983) जैसी फिल्मों में काम किया था और इन सभी फिल्मों में इन्होंने चरित्र भूमिकाएं और मुख्यतौर पर मां के किरदार निभाए थे। साथ ही मराठी फिल्मों में भी ये लगातार एक्टिव रहीं।
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