

पुटकी। 2 नंबर गोपालीचक में 9दिवशीय श्रीमद भागवत कथा के दौरान आचार्य ने कहा भागवत कथा तो वास्तव में गृहस्थियों की ही कथा है। ग्रस्त आश्रम में रहकर भी हम किस तरह भगवान को भज सकते हैं यही हमें भागवत सिखाती है। मनुष्य को गोधूलि बेला के समय चार कार्य नहीं करने चाहिए मनुष्य को सोना नहीं चाहिए नहीं भोजन करना चाहिए बच्चों को उस समय पढ़ना नहीं चाहिए उस समय का पढ़ा हुआ याद नहीं रहता बच्चों को ब्रह्म मुहूर्त में ही पढ़ना चाहिए और मनुष्य को गोधूलि बेला के समय कामवासना से दूर रहना चाहिए नहीं तो हमारे घर मे आसुरी शक्तियां पैदा होती है जैसे-जैसे व्यक्ति का लाभ बढ़ता जाता है वैसे ही लोभ बढ़ता जाता है मनुष्य को एकादशी व्रत तो करना चाहिए व्रत करने से आपके पुण्य संचित होते हैं एवं सत्कर्म एवं भक्ति के कार्य के लिए प्रेरित करता है ध्रुव जी महाराज ने बाल्यावस्था में कठोर तप करके भगवान नारायण को प्रसन्न किया भगवान ने प्रसन्न होकर ध्रुव जी महाराज को 36 हजार वर्षों तक राज करोगे मनुष्य के अंतिम समय में जो मती होगी वही उसकी गति होगी भरत जैसे योगी पुरुष की हर सांस भगवान की भक्ति में लगी थी वह भी अंतिम समय में एक हिरन में आसक्त होने के कारण अगले जन्म में हिरण बनना पड़ा मनुष्य जीवन में एक क्षण का सत्संग मनुष्य को भगवान से मिला देता है अजामिल में पुत्र का नाम नारायण रखा केवल नाम रखने पर ही अजामिल को मोक्ष प्राप्त हुआ हमें भी अपने बच्चों का नाम भगवान के नाम पर ही रखना चाहिए जिससे प्रातः स्मरण में भगवान का नाम आता रहे अंत में हिरंकाशपू व प्रहलाद जी का चरित्र चित्रण का वर्णन किया हुआ हिरंकाश्यप पहलाद जी की झांकी के दर्शन है।

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