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भारतेंदु स्मरण के अंतर्गत सुरभि, बेगूसराय की प्रस्तुति ‘सबै जात गोपाल की’ का मुम्बई में प्रभावशाली मंचन

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Oct 12, 2026
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हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र की स्मृति में बतरस, मुम्बई द्वारा आयोजित ‘भारतेंदु-स्मरण’ कार्यक्रम के अंतर्गत शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को गोरेगांव पश्चिम स्थित केशव गोरे ट्रस्ट, मुम्बई के सभागार में उनकी कहानी ‘सबै जात गोपाल की’ का प्रभावशाली नाट्य मंचन किया गया। बतरस द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बिहार के बेगूसराय की नाट्य संस्था सुरभि की प्रस्तुति ने दर्शकों को हास्य, व्यंग्य और सामाजिक चेतना से भरपूर रंगानुभव प्रदान किया।

भारतेंदु हरिश्चंद्र की रचनात्मक दृष्टि समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती है। ‘सबै जात गोपाल की’ भी जाति-पाँति, ऊँच-नीच और सामाजिक भेदभाव की मानसिकता पर व्यंग्य करती हुई मनुष्य की समानता का संदेश देती है। कहानी का मूल कथ्य यह प्रश्न उठाता है कि जब सभी मनुष्यों में एक ही जीवन और एक ही ईश्वर का अंश विद्यमान है, तब जाति के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का भेद क्यों? हास्य और व्यंग्य के माध्यम से यह रचना सामाजिक रूढ़ियों तथा जातिगत दंभ की विसंगतियों को उजागर करती है।

मंच पर रानावि 2001 के पासआउट सिने अभिनेता जयंत गाडेकर और अभिनेता/निर्दर्शक हरीश हरिऔध ने अपने अभिनय से कथा को जीवंत बनाया। दोनों कलाकारों की संवाद अदायगी, भावाभिव्यक्ति और नाटकीय प्रस्तुतिकरण ने दर्शकों को बाँधे रखा। प्रस्तुति में हास्य के सहज क्षणों के साथ सामाजिक व्यवस्था पर विचार करने के अवसर भी उपस्थित हुए। दर्शकों ने कलाकारों के अभिनय का भरपूर आनंद लिया।

प्रस्तुति में संगीत का महत्वपूर्ण योगदान रहा। श्री विश्वभानु ने मंजरी वादन के माध्यम से नाट्य वातावरण को सजीव बनाने में सहयोग किया। अभिनय और संगीत के सामंजस्य ने प्रस्तुति के प्रभाव को और गहरा किया।

‘सबै जात गोपाल की’ का यह मंचन केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतेंदु हरिश्चंद्र की सामाजिक दृष्टि और प्रासंगिक विचारों को वर्तमान समय से जोड़ने का प्रयास भी बना। जातिगत भेदभाव और सामाजिक विषमता के बीच यह रचना याद दिलाती है कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी मानवीयता से होनी चाहिए।

सम्पूर्ण कार्यक्रम की उद्घोषणा डॉ मधुबाला शुक्ला जी कर रहीं थीं एवम श्री विजय पंडित जी ने उपस्थित सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।

बतरस द्वारा आयोजित ‘भारतेंदु-स्मरण’ में सुरभि, बेगूसराय की यह प्रस्तुति हिंदी साहित्य की कालजयी रचना को रंगमंच के माध्यम से नई पीढ़ी और समकालीन समाज तक पहुँचाने की एक सार्थक पहल रही।


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