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बीना दास : 21 वर्ष की उम्र में अंग्रेज गवर्नर पर गोली चलाने वाली वीरांगना

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Aug 24, 2026
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे अनगिनत वीर-वीरांगनाओं के त्याग, साहस और बलिदान से भरा है, जिन्होंने मातृभूमि की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इनमें कुछ नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गए, तो कुछ समय के साथ विस्मृति के अंधेरे में चले गए। बीना दास ऐसी ही निर्भीक क्रांतिकारी थीं, जिन्होंने महज 21 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश शासन के सर्वोच्च प्रतिनिधियों में से एक बंगाल के गवर्नर पर गोली चलाकर औपनिवेशिक सत्ता को खुली चुनौती दी थी।

 

बीना दास का जन्म 24 अगस्त 1911 को बंगाल के कृष्णानगर में प्रसिद्ध शिक्षक और ब्रह्म समाज से जुड़े समाज सुधारक बेनी माधव दास तथा समाजसेविका सरला देवी के घर हुआ था। उनके परिवार में शिक्षा, सामाजिक चेतना और राष्ट्रभक्ति का वातावरण था। पिता बेनी माधव दास अपने विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने के लिए जाने जाते थे, वहीं उनकी माता सरला देवी सामाजिक कार्यों में सक्रिय थीं। उन्होंने निराश्रित महिलाओं की सहायता के लिए ‘पुण्याश्रम’ नामक संस्था की स्थापना की थी।बीना की बड़ी बहन कल्याणी दास भी स्वतंत्रता आंदोलन की सक्रिय सेनानी थीं। दोनों बहनों ने छात्र जीवन से ही अंग्रेजी शासन के विरुद्ध होने वाली रैलियों और आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। बंगाल उस समय क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। देश की गुलामी, अंग्रेजों का दमन और भारतीयों के साथ भेदभाव ने बीना के मन में ब्रिटिश शासन के खिलाफ गहरा आक्रोश पैदा कर दिया था।

 

6 फरवरी 1932 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बीना दास के साहस के कारण विशेष महत्व रखता है। उस दिन कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह आयोजित था। बंगाल के तत्कालीन गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान करने और समारोह को संबोधित करने वाले थे। बीना दास ने बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और उन्हें भी अपनी डिग्री प्राप्त करने के लिए समारोह में शामिल होना था।

बीना ने अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ विचार-विमर्श के बाद एक अत्यंत जोखिम भरा निर्णय लिया। उन्होंने तय किया कि दीक्षांत समारोह के दौरान वह बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन को निशाना बनाएंगी। उस समय जैक्सन केवल ब्रिटिश प्रशासन के महत्वपूर्ण अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान भी रह चुके थे और ब्रिटेन में काफी प्रसिद्ध थे।समारोह में जैक्सन का भाषण शुरू हुआ। तभी बीना दास ने अपनी पिस्तौल निकाली और गवर्नर पर गोली चला दी। उनका निशाना चूक गया और गोली जैक्सन के कान के पास से निकल गई। गोली की आवाज से पूरे सभागार में अफरा-तफरी मच गई।बीना को पकड़ने के लिए सुरक्षाकर्मी उनकी ओर दौड़े। लेफ्टिनेंट कर्नल सुहरावर्दी ने उन्हें काबू करने का प्रयास किया और उनकी पिस्तौल वाली कलाई को ऊपर की ओर मोड़ दिया। इसके बावजूद बीना ने संघर्ष जारी रखा और कई गोलियां चलाने का प्रयास किया। अंततः उन्हें पकड़ लिया गया और ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

 

जेल की यातनाएं भी नहीं तोड़ सकीं

गिरफ्तारी के बाद बीना दास पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें दस वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। जेल में उनसे उनके क्रांतिकारी साथियों के बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयास किया गया। पूछताछ और दबाव के बावजूद उन्होंने अपने साथियों के नाम बताने से इनकार कर दिया।बीना दास की यह दृढ़ता उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक थी। उन्होंने यह साबित किया कि क्रांति केवल हथियार उठाने का नाम नहीं, बल्कि अपने विश्वास और साथियों के प्रति निष्ठा बनाए रखने का भी नाम है। जेल की कठिनj परिस्थितियां भी उनके संकल्प को नहीं डिगा सकीं।

स्वतंत्र भारत में भी निभाई जिम्मेदारी

1947 में देश स्वतंत्र हुआ। जिन आदर्शों के लिए बीना दास ने अपना युवाकाल जेल में बिताया था, वह सपना साकार हुआ। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में भी अपनी भूमिका निभाई। 1947 से 1951 तक वह पश्चिम बंगाल विधानसभा की सदस्य रहीं।

लेकिन विडंबना यह रही कि स्वतंत्र भारत में भी उनका जीवन सुख और सम्मान से भर नहीं पाया। धीरे-धीरे वह सार्वजनिक जीवन से दूर होती चली गईं। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

 

1986 में ऋषिकेश में उनका शव सड़क के किनारे मिला। उनकी तत्काल पहचान नहीं हो सकी। बाद में जांच और तलाश के बाद पता चला कि वह शव उस वीरांगना का था जिसने कभी ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देकर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। एक महान स्वतंत्रता सेनानी का इस तरह गुमनामी और कठिन परिस्थितियों में जीवन समाप्त होना बेहद मार्मिक और पीड़ादायक प्रसंग है।बीना दास का जीवन स्वतंत्रता संग्राम की उस पीढ़ी की कहानी है जिसने आजादी को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य माना। उन्होंने अपनी जवानी, स्वतंत्रता और व्यक्तिगत सुख राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिए। उनका संघर्ष हमें यह भी याद दिलाता है कि स्वतंत्रता हमें सहज रूप से नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे हजारों ज्ञात-अज्ञात सेनानियों का त्याग और बलिदान था।

आज उनकी जयंती पर बीना दास को याद करना केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उनके साहस, दृढ़ता और राष्ट्रनिष्ठा से परिचित कराना है। 21 वर्ष की एक युवती का ब्रिटिश सत्ता के प्रतिनिधि के सामने निर्भीक होकर खड़ा होना उस दौर के युवाओं की देशभक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक था।

 

 

वरुण कुमार

लेखक एवं कवि


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