
*अंतर्कथा प्रतिनिधि*

पटना ।पटना पुस्तक मेला में आज पद्मभूषण शारदा सिन्हा ने अपने जीवन के अभी तक के सफर के बारे में बताया। शारदा सिन्हा ने कहा कि उम्र सबसे बड़ी बिमारी होती है। पर, मेरा दिल अभी भी जवान है। मैंने दरअसल अपनी संगीत की शुरुआत अपने आंगन से ही शुरू किया, मैंने अपने बड़े भाई की शादी में पहला गीत सीखा. ‘द्वार के छेकाई हे दुलरुवा भैया’ गीत से मेरे संगीत के जीवन की शुरुआत हुई। अपने शुरु के व जीवन संघर्षो के बारे में बताते हुए शारदा सिन्हा ने बताया कि उनके पिताजी ने संगीत के क्षेत्र में आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया। पिता के प्रोत्साहन के बाद मेरे संगीत की यात्रा चल पड़ी। अपने जीवन संघर्ष के बारे में बात करते हुए शारदा सिन्हा ने कहा कि शुरुआत में वे पिताजी के साथ जाती थी संगीत सीखने तो इलाके में लोग ताने मारते थे और कहते थे कि ई पार्टी कहां जा रही है। ज़ब गाडी चलाने लगी तो मिथिला में लोग कहते थे देखो माउगि ड्राइवर। शादी के बाद मेरे ससुराल के लोग धीरे धीरे मेरे संगीत का समर्थन करने लगे। दुल्हिन धीरे धीरे चलहु ससुर गलिया पर लोग उस समय डांस करते थे। हरिहर बांस काटहिए ए बाबा मैंने अपने ससुराल वालों से सिखा.
कॉलेज के समय को याद करते हुए शारदा सिन्हा ने कहा मैं कॉलेज में महाकवि विद्याप्ति के लिए लड़ाई लड़ी. लोकसंगीत को कॉलेज में स्थापित करने के लिए लड़ाईया की. मेरा मानना हैं कि शास्त्रीय संगीत की आत्मा लोकगीत हैं. सूरज बड़जात्या का जिक्र करते हुए शारदा सिन्हा ने कहाँ की मैंने प्यार किया फ़िल्म में गाना गया. छठ का गीत में कोई भेद नहीं था. मेरे घर से ससुराल तक छठ होता था. जिसका मेरा जीवन पे असर पड़ा और मैंने गाना गाया.

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