
अबतक दर्जनों लोगों को लील चुके दशम फॉल की चर्चा अब भुतहा फाल के रूप में होने लगी है। ग्रामीणों की सुनें तो फॉल के इर्द-गिर्द छैला संधु की आत्मा भटक रही है, जिसे स्थानीय लोग देवता की तरह पूजते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार छैला लोक वादक था, जो विभिन्न आयोजनों पर पास के गांवों में गाना-बजाना करता था। छैला लत्तर के सहारे इस फॉल को ऊपर से पार करता था

पुरखों से सुनी-सुनाई बातों को दोहराते हुए ग्रामीण बताते हैं – सदियों पुरानी बात है, फॉल उन दिनों भी बहता था, परंतु उस समय वह जंगलों व पहाड़ों से पूरी तरह से आच्छादित था। वहां तक पहुंचने का न कोई मार्ग था और न ही अन्य साधन। छैला लत्तर (पेड़ की लता) के सहारे इस फॉल को ऊपर ही ऊपर पार करता था। आसपास के गांवों में उसकी साख देख उसके घर के ही कुछ लोग जला करते थे।
एक दिन जब वह लता के सहारे फॉल को पार कर रहा था, परिजनों ने उसे काट डाला और छैला गहरे जल में समा गया। तबसे उसकी आत्मा फाल के इर्द-गिर्द भटक रही है।
प्रकृति प्रेमी था छैला
छैला प्रकृति प्रेमी था। उसे गंदगी से नफरत थी। फाल में डूबने की अधिकांश घटना तब घटी है, जब पर्यटकों ने उसे किसी तरह से प्रदूषित करने की कोशिश की। यही वजह है कि जल में उतरने के पूर्व ग्रामीण छैला संधु (ग्रामीणों की नजर में छैला संधु भगवान) की पूजा करते हैं। चाहे चार दशक पूर्व संत जान के सात बच्चों के डूब जाने की बात हो या फिर पांच यूरोपियन, बीआईटी व गुरुनानक के कई छात्र और दर्जनों पर्यटकों के जलसमाधि लेने की। फाल की भौगोलिक संरचना भी कुछ ऐसी है कि डूबने के बाद अन्य जलाशयों की तरह लाश के सतह पर आने की संभावना लगभग क्षीण रहती है।
कहीं न कहीं यह सब छैला की दुखी आत्मा का ही प्रकोप है, ग्रामीण कहते हैं,ऐसा ग्रामीण कहते हैँ।
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