
पंकज ठाकुर
बड़कागांव । झारखंड के मानचित्र पर बड़कागांव की पहचान कोयले की धरती के रूप में है। यहां की जमीन से निकलने वाला कोयला देश के कई हिस्सों को ऊर्जा देता है और बिजलीघरों को रोशन करता है, लेकिन विडंबना यह है कि जिस बड़कागांव की धरती से कोयला निकलकर देश को जगमगाने का दावा किया जाता है, उसी बड़कागांव के लोग बिजली के लिए तरस रहे हैं। क्षेत्र में कभी 12 घंटे, कभी 20 घंटे तो कभी 32 और 48 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस इलाके से करोड़ों-करोड़ों रुपये का कोयला निकल रहा है, वहां के लोगों को निर्बाध बिजली के लिए आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा? कोयले की चमक देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच रही है, लेकिन बड़कागांव के गांवों में अंधेरा छा जाना व्यवस्था की विडंबना को उजागर करता है।

*पूर्व विधायक अंबा प्रसाद के कार्यकाल में शुरू हुआ पावर ग्रिड अब तक अधूरा*

बिजली संकट से स्थायी निजात दिलाने के लिए वर्ष 2024 से पहले, जब क्षेत्र की विधायक अंबा प्रसाद थीं, उस समय पावर ग्रिड निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। लेकिन निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हो सका है। स्थानीय लोगों के बीच यह परियोजना अब सवालों के घेरे में है। लोगों का कहना है कि वर्षों बाद भी यदि पावर ग्रिड धरातल पर पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहा है तो ऐसी परियोजना आखिर किस काम की? स्थानीय लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि पावर ग्रिड निर्माण को बिजली संकट के समाधान की उम्मीद के रूप में देखा गया था, लेकिन इसके अधूरे रहने से लोगों की उम्मीदें भी अधर में लटकी हुई हैं। ग्रामीण इसे ‘हाथी के दांत’ की संज्ञा देते हुए सवाल उठा रहे हैं कि जब परियोजना पूरी होकर बिजली आपूर्ति को मजबूत ही नहीं कर पा रही, तो इसका लाभ आम जनता को कब मिलेगा?
*एनटीपीसी की कोयला परियोजनाएं तेज, बिजली व्यवस्था क्यों नहीं?*
बड़कागांव क्षेत्र में एनटीपीसी की कोयला परियोजनाओं से जुड़े कार्य लगातार आगे बढ़ रहे हैं। कोयला उत्पादन और परिवहन के लिए बड़ी-बड़ी व्यवस्थाएं दिखाई देती हैं, लेकिन स्थानीय बिजली व्यवस्था की हालत लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि कोयला निकालने के लिए सड़क, परिवहन और अन्य संसाधनों की व्यवस्था की जा सकती है, तो स्थानीय लोगों के घरों तक नियमित बिजली पहुंचाने के लिए मजबूत व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती? लोगों का यह सवाल सरकार और एनटीपीसी दोनों की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
*अंधेरे में पढ़ाई, ठप कारोबार और बेहाल ग्रामीण*
लगातार बिजली कटौती से विद्यार्थी, दुकानदार, छोटे कारोबारी और आम उपभोक्ता परेशान हैं। बिजली नहीं रहने से पढ़ाई प्रभावित होती है, छोटे व्यवसायों को नुकसान होता है और पेयजल जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी असर पड़ता है।
बड़कागांव की जनता के सामने आज विडंबना यह है कि जिस जमीन से निकलने वाला कोयला देश को रोशन कर रहा है, उसी जमीन के लोग बिजली के लिए मोहताज हैं।
सरकार और एनटीपीसी से लोगों का सीधा सवाल है
*कोयला बड़कागांव का, ऊर्जा देश की, लेकिन रोशनी बड़कागांव के घरों से इतनी दूर क्यों?*
अब लोगों की मांग है कि अधूरे पावर ग्रिड का निर्माण जल्द पूरा कर उसे पूरी क्षमता से चालू किया जाए तथा 12 से 48 घंटे तक होने वाली बिजली कटौती का स्थायी समाधान निकाला जाए। बड़कागांव की जनता अब आश्वासन नहीं, बल्कि नियमित और निर्बाध बिजली व्यवस्था चाहती है।
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