

ब्रह्मांड के सबसे पहले और सबसे बड़े वास्तुकार इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती हर साल 17 सितंबर को मनाई जाती है। इस दिन लोग मशीनों, औजारों और वाहनों की पूजा करते हैं। हर साल पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, त्रिपुरा, कर्नाटक, असम में इस पर्व को काफी धूम-धाम से मनाया जाता है।

माना जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से इंसान के सारे कष्ट तो दूर होते ही है, साथ ही उसका बिजनेस दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की भी करता है और उसके कारोबार पर कभी कोई संकट नहीं आता है।

*क्या है पूजा का शुभ मुहूर्त*
वैसे तो विश्वकर्मा जंयती रविवार को पूरे दिन है और भगवान की पूजा किसी भी प्रहर की जा सकती है, लेकिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा का शुभ मुहूर्त 17 सितंबर को सुबह 7 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 26 मिनट तक रहेगा। अगर आप कोई पूजा शुभ मुहूर्त में करते हैं तो आपको शुभ फल की प्राप्ति होती है।
*पूजा विधि*
पूजा वाले दिन सबसे पहले नहाधोकर साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
अगर आप व्रत रखना चाहते हैं को व्रत का संकल्प लें।
भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या चित्र की पूजाकरें।
अक्षत, हल्दी, फूल, पान, फल सब भगवान को अर्पित करें।
इसके बाद समस्त मशीनों, औजारों की पूजा करें।
आरती करें, प्रार्थना करें और प्रसाद बांटे।
*कथा*
सृष्टि के जनक ब्रह्मा के पुत्र धर्म थे और उनके बेटे का नाम वास्तुदेव था, जो कि बहुत अच्छे शिल्पकार थे। उनके और अंगिरसी के पुत्र का नाम था विश्वकर्मा, जो कि अपने पिता की तरह काफी योग्य और अच्छे वास्तुकार थे। वो काफी चतुर थे, उन्होंने ही कई वस्तुओं का आविष्कार किया था।
*महर्षि दधीचि की हड्डियों से बनाया वज्र*
कहा जाता है कि एक बार राक्षसों ने सभी देवताओं का जीना मुहाल किया था, तब विश्वकर्मा भगवान ने महर्षि दधीचि की हड्डियों से एक बेहद कठोर वज्र का निर्माण किया था, उसी वज्र से इंद्रदेव ने राक्षसों को खात्मा किया था। वो एक सृजनककर्ता थे, उन्होंने रावण की सोने की लंका और भगवान कृष्ण का नगरी द्वारिका. पांडवों की हस्तिनापुर और विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र जैसी कई चीजें बनाई थी।
*नोट:* यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। लेख से संबंधित किसी भी इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है इसलिए किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिष या पंडित की राय जरूर लें।
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