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सरायकेला: 54 साल का इंतज़ार खत्म, धपुआ बस्ती में अनशन से शुरू हुआ ‘नाकाबंदी’ का अल्टीमेटम । 

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Jun 17, 2026
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सरायकेला।: कोल्हान के पूर्वी सिंहभूम जमशेदपुर की एक परिवार की आवाज , साढ़े पांच दशक से लटके जमीन मुआवजे के विवाद ने अब निर्णायक मोड़ ले लिया है। घाटशिला के साउथ सूरदा क्षेत्र की धपुआ बस्ती में बुधवार सुबह से दीपक पातर अपने पूरे परिवार के साथ अनशन पर बैठ गए हैं। 54 साल पहले कंपनी द्वारा अधिग्रहित की गई पुश्तैनी जमीन का मुआवजा और रोजगार न मिलने से आक्रोशित परिवार ने “आज भुगतान, नहीं तो कल नाकाबंदी” का अल्टीमेटम दे दिया है।

 

कैसे शुरू हुआ 54 साल पुराना विवाद ।दीपक पातर, जो मनबोध पातर के नाती हैं, का दावा है कि 13 फरवरी 1974 को उनकी पुश्तैनी जमीन को हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड HCL ने अधिग्रहित कर लिया था। उस समय भागवत पातर, मनबाट तांती, सूजन तांती टाटी और लोचन तांती के साथ कंपनी का एग्रीमेंट हुआ था। परिवार का आरोप है कि एग्रीमेंट में वादा किए गए मुआवजे और रोजगार में से कुछ भी नहीं मिला। तब से अब तक तीन पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन न्याय का इंतज़ार जारी है।

 

*PM से लेकर DC तक, हर दरवाजा खटखटाया*

अनशन स्थल पर दीपक पातर ने बताया, “हमने चुपचाप सहा, अर्जी लगाई, गुहार लगाई। 10 मार्च 2026 को प्रधानमंत्री, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री, विधि सचिव, मुख्यमंत्री, जिला उपायुक्त घाटशिला, अनुमंडल पदाधिकारी और मुसाबनी थाना को रजिस्टर्ड विज्ञापन और आवेदन भेजे। 15 दिन पहले फिर से रिमाइंडर ज्ञापन दिया कि 17 जून से अनशन करेंगे।”

 

परिवार का कहना है कि हर बार आश्वासन मिला, फाइलें इधर-उधर घूमीं, पर धरातल पर कुछ नहीं बदला। अब आर्थिक तंगी और बेबसी ने तीसरी पीढ़ी को सड़क पर उतार दिया है।

 

अनशन स्थल पर गूंजे नारे, हाथों में तख्तियां।

 

धपुआ बस्ती के अनशन मंडप पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों समेत पूरा परिवार मौजूद है। हाथों में “जमीन हमारी, हक हमारा”, “वादा नहीं अधिकार चाहिए”, “जमीन गई रोजगार नहीं, आखिर यह कैसा विकास”, “एक ही मांग, एक ही नारा – न्याय मिले अबकी बार” लिखी तख्तियां हैं। नारेबाजी से पूरा इलाका गूंज रहा है।

 

दीपक पातर ने साफ कहा, “यह अनशन अंतिम चेतावनी है। अगर आज शाम तक मुआवजे का चेक नहीं मिला तो बुधवार सुबह से सूरदा खदान गेट की नाकेबंदी शुरू कर देंगे। न कोई गाड़ी अंदर जाएगी, न बाहर निकलेगी।”

 

*आंदोलनकारियों के 3 बड़े सवाल*

*बॉक्स*

1. *मुआवजा कहां है?* – अगर 1974 में जमीन ली गई तो 54 साल बाद भी भुगतान क्यों नहीं हुआ?

2. *आवेदन पर मौन क्यों?* – प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर जिला प्रशासन तक भेजे गए दर्जनों आवेदनों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

3. *समाधान कब?* – क्या अब प्रशासन और कंपनी मिलकर कोई ठोस, समयबद्ध समाधान देंगे या फिर आंदोलन को और उग्र करना पड़ेगा?

प्रशासन और कंपनी का पक्ष, समाचार लिखे जाने तक हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड प्रबंधन और घाटशिला अनुमंडल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार अधिकारी मामले की फाइलें खंगाल रहे हैं।

 

दीपक पातर का कहना है कि परिवार अब पीछे हटने को तैयार नहीं है। “हम हिंसा नहीं चाहते, सिर्फ अपना हक चाहते हैं। जमीन चली गई, रोजी-रोटी चली गई। अब अगर हक भी नहीं मिला तो जिंदा रहने का मतलब क्या?” उन्होंने कहा।

 

54 साल के इंतज़ार के बाद शुरू हुआ यह अनशन अब साउथ सूरदा की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। अगले 24 घंटे तय करेंगे कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण समाधान की ओर जाएगा या नाकाबंदी की राह पर।


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