
सरायकेला : केंद्र और राज्य सरकार के लगातार सर्च ऑपरेशन के बाद नक्सल संगठन की कमर टूट रही है। इसी बीच 5 अगस्त को सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह थाना क्षेत्रअंतर्गत दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी की तराई में हुए संयुक्त सर्च ऑपरेशन में दो हार्डकोर नक्सलियों को हथियार के साथ गिरफ्तार किया गया।
गिरफ्तार दोनों नक्सली सिर्फ साथी नहीं, बल्कि 16 साल से एक-दूसरे के जीवनसाथी भी थे। संगठन के अंदर ही उन्होंने शादी कर ली थी।

*कौन हैं मीना पहाड़िया?*

मीना पहाड़िया पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बलरामपुर थाना क्षेत्र के बढ़कोचा टोला, आमकोचा गांव की रहने वाली है। पिता स्व. सुखू पहाड़िया और मां मोनी पहाड़िया की दूसरी बेटी मीना महज 11 साल की उम्र में ही अयोध्या पहाड़ के नक्सल संगठन में शामिल हो गई थी।
परिजनों का कहना है कि नक्सलियों ने मीना को “परिवार को सरकारी नौकरी दिलाने” का प्रलोभन देकर बहलाया-फुसलाया। पिता की मौत के बाद मां जंगल की सूखी लकड़ी बेचकर परिवार का गुजारा करती थीं।
मीना की बड़ी बहन ने बताया, “बहन एक बार घर से गई तो फिर कभी वापस नहीं आई। आज उसे देखकर पहचानना भी मुश्किल है।”
आज भी पहाड़िया परिवार मिट्टी की दीवार और टीन के छप्पर वाले घर में रहने को मजबूर है। पीने के लिए जंगल के झरने का पानी इस्तेमाल करते हैं। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लगाया गया सोलर पंप भी खराब पड़ा है। बरसात में सांप-बिच्छू का डर और स्वास्थ्य केंद्र 20-40 किलोमीटर दूर होने के कारण गर्भवती महिलाओं को खटिया पर लादकर ले जाना पड़ता है।
*कौन हैं सागर सिंह सरदार?*
दूसरा नक्सली सागर सिंह सरदार सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह थाना क्षेत्र के टेगाडीह पंचायत के बेनाडीह टोला का रहने वाला है। पिता रामसिंह सरदार के बड़े बेटे सागर वर्ष 2008 में महज 12 साल की उम्र में दलमा के हार्डकोर नक्सली और एरिया कमांडर स्व. महावीर खड़िया के संपर्क में आकर संगठन में शामिल हो गया था।
सागर का परिवार भी आज कृषि और जंगल पर ही निर्भर है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।
*16 साल साथ, फिर सलाखों के पीछे*
सूत्रों के अनुसार मीना और सागर संगठन में मिले और यहीं प्रेम हुआ और शादी भी कर ली। दोनों ने मिलकर 16 साल तक दस्ते में काम किया। परिवार वालों को बाद में पता चला कि दोनों ने शादी कर ली है और साथ में रह रहे हैं।
5 अगस्त को सुरक्षा बलों के सर्च ऑपरेशन में दोनों को हथियारों के साथ दबोच लिया गया। 16 साल तक “क्रांति” के नाम पर जान जोखिम में डालने वाले इस प्रेमी युगल की कहानी अब जेल की सलाखों में जाकर खत्म हुई।
*सवाल: नक्सल बनने का जिम्मेदार कौन?*
इस पूरे मामले ने कई सवाल खड़े किए हैं। नक्सल संगठन द्वारा किए गए बड़े-बड़े वादे कितने झूठे निकले, इसका जीता-जागता उदाहरण इन दोनों के परिवार हैं।
आज भी अयोध्या पहाड़ और दलमा के सीमांत गांव सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। इसी अभाव और प्रलोभन का फायदा उठाकर न जाने कितनी बेटियों को नक्सल संगठन में धकेला जा रहा है।
अब देखना होगा कि कानून के दायरे में आने के बाद इन दोनों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाता है या नहीं, और उनके परिवारों को मूलभूत सुविधाएं कब मिलेंगी।
फिलहाल दोनों नक्सलियों से पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां पूछताछ कर रही हैं।
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