
डुमरी:झारखंड बिहार की सबसे ऊंची पहाड़ पार्श्वनाथ
पर स्थित जैनियों के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल का जिस अनुपात में विकास होना चाहिए वह झारखंड सरकार के द्वारा नहीं किया जा रहा है,यह कहना है शिक्षाविद देवेश कुमार देव का।श्री कुमार बुधवार को संवाददाता से बातचीत कर रहे थे,उन्होंने कहा कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों ने यहां पर अंतिम समाधि ली है,इसी से इस प्राकृतिक मनोरम देवधाम तुल्य इस स्थली के महत्व को समझा जा सकता है.इस पवित्र भूमि तक रेल मार्ग से पहुंचने के लिए लोग पारसनाथ स्टेशन पर उतरते हैं और भगवान के दर्शन करने से पूर्व खराब, गंदगी से भरी और संकरी सड़क से गुजरते हैं तो झारखंड की छवि पर दाग प्रतीत होता है.पावन
इस तीर्थस्थल को राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयोग किया जाना भी अनुचित है।राजनीतिक दलों
ने अपने रैली एवं पार्टी की बैठक के लिए अच्छी जगह मात्र समझ लिया है.गौरतलब हो कि पारसनाथ पठारी क्षेत्र प्राचीन गोंडवाना लैंड का हिस्सा है,जो प्राकृतिक दुर्लभ वनस्पतियों व जीव-जन्तुओं की आश्रय-स्थली है.आज तक वहां पर एक अच्छा वनस्पति उद्यान या जीव शरणस्थली विकसित किऐ जाने का प्रयास भी किसी सरकार ने नहीं किया है.सोरिया रोबस्टा जो कि झारखंड का राजकीय पेड़ है,उससे यह वन अच्छादित है.एंड्रोग्राफिस पेनीकुलाटा,अम्बलीका ओफिसिनेलिस, अर्जुना इंडिका जैसे सैकड़ों बहुमूल्य औषधीय गुणों वाले पौधे यहां उपलब्ध हैं परन्तु इनके संरक्षण की उपेक्षा की वजह से अवैध रूप से इसे नष्ट किया जा रहा है.सरकार को पारसनाथ पहाड़ी क्षेत्र में हो रहे अवैध उत्खनन और अवैध निर्माण पर भी शिकंजा कसना होगा.पारसनाथ पहाड़ी क्षेत्र की एक बहुत बड़ी समस्या हर साल इसके जंगलों में लगने वाली आग है. यह प्राकृतिक प्रक्रिया ही नहीं वरण मानव जनित समस्या है.गांव वाले हर साल जंगलों में आग लगाकर अपने रास्ते को साफ करते हैं जो बढ़ते बढ़ते पूरे वन में मौजूद लाखों की वनस्पतियों को नष्ट कर देते हैं और वन्य जीवों का आक्षय स्थल छीन लेते हैं.इस विषय पर भी सरकार और प्रशासन ही नहीं हम आम जनता को सजग होना चाहिए.पारसनाथ से लगभग 35 किलोमीटर पर स्थित तोपचांची झील की उपेक्षा कर सरकार ने पर्यटन के एक बहुत बड़ी संभावना को धूमिल कर दिया है.पारसनाथ और तोपचांची झील साइबेरियन पक्षियों का प्रिय स्थल हुआ करता था जो अब वीरान लगता है.पर्यटन उद्योग 5वां सबसे बड़ा राजकोष में योगदान देने वाला माध्यम है.प्राकृतिक वन्यजीवन के संरक्षण,पर्यटन को बढ़ावा देने व 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के नाम से जाने वाले इस क्षेत्र के सम्पूषणीय विकास की अपेक्षा हम आमजन सरकार,प्रशासन और नीति नियंताओं से करते हैं।

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