
सरायकेला – सरायकेला मुख्यालय सहित आसपास शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रविवार को शरद पूर्णिमा का पावन पर्व पूरे श्रद्धाभाव, पारंपरिक रीति-रिवाज और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर सीनी और महालीमुुरुप सहित विभिन्न इलाकों के मंदिर और पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालुओं ने मंदिरों में पहुंचकर माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की। महिलाओं ने माता को फल, फूल और भोग अर्पित कर अपने परिवार में सुख, शांति, समृद्धि तथा खुशहाली की मंगल कामना की। देर रात तक मंदिरों और घरों में भजन-कीर्तन का दौर चलता रहा।

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का बहुत ही विशेष आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे वर्ष में केवल इसी रात को चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा से निकलने वाली शीतल किरणें धरती पर सीधे अमृत वर्षा करती हैं, जो पूरी प्रकृति और मानव जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।

शरद पूर्णिमा की रात को मिट्टी या चांदी के बर्तन में गाय के दूध से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसी अटूट मान्यता है कि चंद्रमा की अमृतमयी किरणें पड़ने से यह खीर औषधीय और अत्यंत गुणकारी तत्वों से युक्त हो जाती है।
इस खीर को अगले दिन सुबह परिवार के सभी सदस्य अत्यंत पवित्र प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। आयुर्वेद और लोक मान्यताओं के अनुसार, यह प्रसाद स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है।
पौराणिक और सनातन मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन और अलौकिक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में शरद ऋतु की सुहानी रात को गोपियों के साथ प्रसिद्ध ‘महारास’ रचाया था।
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