
त्रेता युग में पांच पांडव अज्ञातवास में के समय भीम द्वारा बनाया गया चूल्हा, अर्जुन द्वारा पूजे गये शिवलिंग , हाथी, घोड़े की पंज, पत्थर का लिखावट , अर्जुन द्वारा चले गए वाण से छेद पेड़ आज भी जीवित है। लोग इसको देखने के लिए देखने के साथ-साथ नदी के बीच में स्थित शिवलिंग पर शिव की पूजा अर्चना करते हैं।
बोंगबोगा नदी तट पर स्थित बाबा पांडेश्वर ऐसी ऐतिहासिक कहानियां है, जो पांडवों से जुड़े हैं। यहां द्वापर युग में पांडु पुत्र भीम की ओर से स्थापित श्री श्री पांडेश्वर महादेव की महिमा जीवन की घटनाओं से लड़ने की क्षमता वह ऊर्जा प्रदान कर विजयी दिलाने वाली है। इस क्षेत्र में प्रचलित दंतकथा के अनुसार इसकी खोज सरायकेला राजा के अधीनस्थ बाना के जमींदार स्वर्गीय गंगाधर सिंह देव के कल से एक किसान द्वारा अपनी दुधारू गाय के अन्वेषण के क्रम में हुई। लोकश्रुति , संस्कृति , विश्वास व परंपराओं के अध्ययन एवं विश्लेषण के अनुसार महाभारत काल में माता कुंती सहित पांडवों का पदार्पण क्षेत्र में हुआ था। प्रसंग वश हिडिंम्बबध भीम हिडिंम्बा विवाह कथा इस क्षेत्र से जुड़ी है

अर्जुन वृक्ष के दो शाखाएं पुनः संयोजित होकर एक से तीन और दूसरी से दो उपशाखाये निकली है। यह पांचों शाखाएं पांच पांडवों का व दो शाखाएं माता कुंती और माद्री का प्रतिनिधित्व करते है। यह वृक्ष पांडुपुत्रों के अटूट एकता का संकल्प को दर्शाता है।

भीम के बनाये चूल्हे व अर्जुन के बाण से निकले तीर के निशान दर्शकों को आकर्षित करती है।
अज्ञातवास के समय भीमखंदा पर्यटक स्थल स्थित श्री श्री पांडेश्वर महादेव के उत्तर दिशा में चट्टान पर बने चूल्हानुमा आकृति को श्री श्री भीमखंदा कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है भीम का चूल्हा , स्थानीय भाषा में गंदा का अर्थ है भोजन पकाने के लिए निर्मित चूल्हा व उसके उत्तर में चावल के मार पसारने का निशान है। मान्यता है कि भीम हिडिंबा विवाह के अवसर पर आयोजित राजकीय भोज की भोज सामग्री अन्य व्यंजनादी इस चूल्हा पर स्वयं भीम ने पकाया था , समाज के लोग समारोह में शामिल होकर भोज का लुफ्त उठाया था।
मकर संक्रांति के दिन लोग इस चूल्हे के आर पार होकर जीवन को निष्पक्ष व सफल बनाने की कामना करते हैं।
यहां भीम के पैर के निशान मिलने की मान्यता है , मानव विज्ञान की गणनानुसार पैर की निशान 20 से 30 फीट तक हो सकती है। पुराणों में वर्णित संदर्भों के अनुसार द्वापर युग में लोगों की ऊंचाई यही थी ।
भीमखंदा पर्यटक स्थल है। सरकार भीमखंदा को पर्यटक स्थल के रूप में विकसित कर रही है। यहां बैठने के लिए चेयर से लेकर झूले आदि लगाए गए हैं।
यहां पर उड़ीसा , बंगाल, चाईबासा , जमशेदपुर, सरायकेला , बिहार एवं आसपास से प्रतिदिन सैकड़ो लोग आकर भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते हैं। नदी के बीचों-बीच भगवान भोलेनाथ विराजमान है। बरसात के दिनों से पहले नदी में बाढ़ आने से मंदिर बालू से ढक जाता था। उसके बाद मंदिर के बालू हटाकर पूजा अर्चना की जाती थी। सरकारी स्तर से विकसित किए जाने के कारण मंदिर में अभी बालू नहीं ढकता है। मंदिर के पुजारी विजय कुमार पति ने बताया कि यह स्थल महाभारत काल से जुड़ा है। शिवरात्रि के समय हरि संकीर्तन धूमधाम आयोजन होता है।
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