
*अंतर्कथा प्रतिनिधि (सुजीत कुमार)*
बिहार के तमाम पंचायत में डेढ़ साल बीत जाने के उपरांत भी पंचायतों में काम किस तरीके का है लोगों की जुबान से सुनकर समझ पाना बड़ा ही असंभव प्रतीत होता है। आज पंचायत में मुखिया पंचायत का प्रधान तो होता है लेकिन उनकी प्रधानता पर भी आज कई सवाल खड़े हो रहे हैं, जिस तरीके से एक पिता अपने पुत्र का पालन पोषण कर उससे कहीं ना कहीं कुछ उम्मीदें रखते हैं तो ठीक उसी तरह चुनाव में खड़े होने वाले प्रतिनिधि का लोग चुनाव अपने पंचायत में आने वाले दिनों में पंचायत का विकास को लेकर करते हैं। लेकिन आज जब पंचायत में मुखिया चुन लिया गया तो भी लोगों को कोई संतुष्टि नहीं है कारणों पर गौर करें तो कारण अलग-अलग और कई सारे दिखने को मिलते हैं इनमें कुछ कारण योजना से संबंधित होता है तो कुछ लोगों को मिले हुए लुभावने वादे जिसे पूरा कर पाने में मुखिया सक्षम नहीं होता है। इसके अलावे अन्य कारण होते हैं। बात पंचायत में सर्वप्रथम योजनाओं की करें तो योजनाएं कितनी आती है और उसकी रकम कितनी होती है आम जनता को समझ आ पाना उसे लोहे के चने चबाने जैसा प्रतीत होता है। मुखिया योजनाओं की जानकारी लोगों को नहीं देते बल्कि कामों को खुद अपने चहेते और चेले चमचों से करवाकर अपना कमीशन निकालने के चक्कर में रहते हैं। जबकि चुनाव के समय लोगों से यह वादा कर लिया जाता है कि पंचायत में जितना भी योजना मिलेगा वह कहीं ना कहीं लोगों को बताया जाएगा। लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद ढाक के तीन पात वाली कहानी उजागर हो जाती है। मुखिया अपने काम में मस्त, उनके चेले चमचे कमीशन कमाने में मस्त और अधिकारी एक कदम शांत गाय की भांति बैठकर सिर्फ पंचायत में होने वाले कामों को फाइलों के जरिए देखने में मस्त रहते हैं। ऐसे में लोगों के द्वारा बहिष्कार हो पाना भी बड़ा मुश्किल होता है क्योंकि लोगों को पता होता है की चुनाव होने के बाद जो भी प्रतिनिधि चुनकर मुखिया बनते हैं वह अधिकारियों से मिलकर अपना दाल गलाते हैं और पंचायत के उन्हीं लोगों को पहचानते हैं जिनके पास रंग और रुतबा होता है बाकी का कोई काम ही नहीं होता। जबकि तमाम योजनाओं की जानकारी मुखिया को जनता दरबार लगाकर उनके बीच देना होना चाहिए था लेकिन अधिकांश जगहों पर तकरीबन 90% जगहो पर ऐसा काम नहीं होता है और लोग दवे जुबान चुने गए मुखिया को गाली भी देते हैं और यह मनसा बना लेते हैं की आने वाले समय में अमुक व्यक्ति को वोट नहीं देकर मुखिया भी नही चुनना है। वर्तमान की दिशा में जब मुखिया से बात की गई तो मुखिया के द्वारा यह पाया गया कि वर्तमान की सरकार में बीते सालों में योजनाओं का जो क्रमबद्ध होना चाहिए था वह क्रमबद्ध नहीं है जिसके कारण से आज पंचायत में मुखिया आम लोगों के बीच लज्जित होने के साथ-साथ ठगा महसूस कर रहा है आज सरकार भी कहीं ना कहीं अपना हाथ उठाकर साफ साबित कर रहा है कि पंचायत में योजनाओं को देने के लिए उनके पास रुपया ही नहीं है और ऐसे आलोक में पंचायत में काम हो पाना बहुत मुश्किल है। वहीं इसको लेकर पंचायत के तमाम वार्ड मेंबर भी आज कहीं ना कहीं मुखिया से नाखुश नजर आते हैं। वार्ड मेंबर भी अपने वार्ड में होने वाले कामों में मुखिया को किसी भी प्रकार से वार्ड सदस्य को सहयोग न करने का आरोप लगाते दिख रहे हैं। वार्ड मेंबर भी मुखिया को कोसते हुए साफ कहते दिख रहे हैं कि वार्ड में भी कामों की जिम्मेदारी मुखिया ने खुद ले रखी है जिसके कारण से आने वाले समय में वार्ड मेंबरों का कोई रोल ही नहीं बचेगा और ऐसे में चुनाव के दिनों में सिर्फ मुखिया के चुनाव में ही लोगों की आपसी प्रति स्पर्धा नजर आएगी। इसके अलावे वार्ड के चुनाव को लेकर लोगों के बीच कोई भी प्रतिस्पर्धा नहीं होगी क्योंकि आज पंचायत में सर्वे सर्वा मुखिया ही अपना अहम रोल निभाकर गाये बजाए कहीं ना कहीं योजनाओं के कामों को करवाने में लगे रहते हैं। पंचायत में आम लोगों की जुबान भी कहीं ना कहीं पंचायत के मुखिया पंचायत समिति और वार्ड को लेकर दबे जुबान गालियां ही देती नजर आती है लोग दबे जुमन यह कहने से कतराते नहीं की होने वाले चुनाव में जो मिल सके उसे लेकर बैठ जाना ही सबसे चालाकी का काम होता है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद मुखिया पंचायत समिति और वार्ड मेंबर सिर्फ अपने घर और अपने पेट को भरने में लगे रहते हैं तो ऐसे में चुनाव के वक्त मिलने वाला रुपया अथवा अन्य सामग्री आम जनता के लिए वहीं तक सीमित हो जाता है बाकी विकास तो अपना होता है पंचायत का नहीं। निष्कर्ष कि अगर बात करें तो पंचायत में कम योजनाओं का आगमन पंचायत के मुखिया और वार्ड सदस्यों को भी आम लोगों के बीच बेइज्जत करने का काम किया है क्योंकि चुनाव के समय में किए गए बड़े-बड़े वादे आज कहीं ना कहीं टाय टाय फिश सा दिख रहा है।

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