
कचरा सही जगह, सही समय और सही कर्म
वह एक बिल्कुल साधारण-सी सुबह थी।

मैं वॉशरूम गया। वहाँ मेरी नज़र एक छोटे-से प्लास्टिक के पाउच पर पड़ी। मैंने सोचा—यह कचरा है। उसे उठाया और मन में आया कि वॉशरूम के पीछे फेंक देता हूँ। वहाँ कोई देख भी नहीं रहा था और मेरे लिए बात वहीं खत्म हो जाती।

लेकिन पाउच फेंकने से ठीक पहले मैं रुक गया।
अचानक मन में एक विचार आया—
“अगर इसे पीछे फेंक दिया और यह नाली में चला गया तो?”
नाली जाम हो सकती थी। पानी रुक सकता था। गंदगी फैल सकती थी। एक छोटी-सी सुविधा आगे चलकर बड़ी परेशानी बन सकती थी।
मैंने अपने हाथ को रोक लिया।
फिर स्वयं से पूछा—
“इसकी सही जगह क्या है?”
उत्तर सामने था—
डस्टबिन।
मैंने वह पाउच डस्टबिन में डाल दिया।
काम बहुत छोटा था, लेकिन उस क्षण मेरे भीतर एक बहुत बड़ी बात जन्म ले चुकी थी।
मैं सोचने लगा—
क्या इंसान की जिंदगी भी इसी तरह नहीं है?
हमारे सामने भी रोज़ बहुत-सी चीजें आती हैं। हम उनमें से कुछ को स्वीकार करते हैं, कुछ को अस्वीकार करते हैं और कुछ को अपने जीवन से बाहर निकाल देना चाहते हैं।
लेकिन सवाल केवल यह नहीं है कि हम क्या करते हैं।
सवाल यह भी है कि—
हम उसे कहाँ रखते हैं?
क्रोध को अगर सही जगह न मिले तो वह रिश्तों में चला जाता है।
अहंकार को अगर नियंत्रित न किया जाए तो वह व्यक्तित्व में भर जाता है।
ईर्ष्या को अगर मन में जगह दी जाए तो वह शांति को खा जाती है।
गलती को अगर स्वीकार न किया जाए तो वह आदत बन जाती है।
और नफरत को अगर दिल में जगह मिल जाए तो इंसानियत का रास्ता बंद हो जाता है।
जिस तरह प्लास्टिक का एक छोटा-सा टुकड़ा नाली को जाम कर सकता है, उसी तरह मन का छोटा-सा विकार भी जीवन के रास्ते को रोक सकता है।
उस दिन मुझे यह भी महसूस हुआ कि हमारी अंतरात्मा शायद उस डस्टबिन की तरह है, जो हमें बताती है कि क्या रखना है और क्या छोड़ देना है।
लेकिन अंतरात्मा की आवाज़ बहुत धीमी होती है।
दुनिया की आवाज़ बहुत तेज़ होती है।
दुनिया कहती है—“सब ऐसा ही करते हैं।”
अहंकार कहता है—“तुम क्यों झुको?”
क्रोध कहता है—“अभी जवाब दो।”
स्वार्थ कहता है—“पहले अपना फायदा देखो।”
लेकिन अंतरात्मा धीरे से कहती है—
“रुक जाओ… सोचो… यह सही नहीं है।”
इंसान की असली परीक्षा शायद वहीं होती है।
जब कोई देखने वाला न हो, तब हम क्या करते हैं?
जब कोई रोकने वाला न हो, तब हम स्वयं को रोकते हैं या नहीं?
जब गलत रास्ता आसान हो और सही रास्ता थोड़ा कठिन, तब हम किसे चुनते हैं?
यही हमारे चरित्र की पहचान है।
हम अक्सर समाज में बड़े बदलाव की बातें करते हैं। लेकिन बड़े बदलाव की शुरुआत बहुत छोटी होती है।
एक कचरा डस्टबिन में डालने से।
एक झूठ बोलने से खुद को रोकने से।
एक कठोर शब्द को होंठों तक आने से रोकने से।
किसी दुखी व्यक्ति की बात ध्यान से सुन लेने से।
किसी की गलती पर उसे अपमानित करने के बजाय समझाने से।
और कभी-कभी अपने भीतर जमा वर्षों पुराने “कचरे” को बाहर निकाल देने से।
उस दिन मेरे हाथ में केवल एक प्लास्टिक का पाउच था।
लेकिन उस पाउच ने मुझे मेरी जिंदगी का एक बड़ा सबक दे दिया—
हर चीज़ की एक सही जगह होती है।
कचरे की जगह डस्टबिन है।
गलती की जगह सीख है।
गुस्से की जगह संयम है।
धन की जगह सेवा है।
ज्ञान की जगह व्यवहार है।
और इंसान की सबसे सही जगह है—
इंसानियत।
इसलिए अगली बार जब आपके हाथ में कोई कचरा आए, तो उसे डस्टबिन में डालने के साथ एक क्षण अपने भीतर भी झाँकिए।
अपने आप से पूछिए—
“मेरे भीतर ऐसा कौन-सा कचरा है, जिसे मुझे आज बाहर निकाल देना चाहिए?”
शायद कोई पुराना गुस्सा।
शायद कोई शिकायत।
शायद कोई अहंकार।
शायद कोई नफरत।
शायद कोई गलत आदत।
उसे पहचानिए।
उसे स्वीकारिए।
और फिर उसे अपनी जिंदगी से बाहर कर दीजिए।
क्योंकि—
साफ सड़क से सुंदर शहर बनता है,
लेकिन साफ मन से सुंदर इंसान बनता है।
और सुंदर इंसान ही सुंदर परिवार, सुंदर समाज और सुंदर दुनिया का निर्माण कर सकता है।
कभी-कभी जिंदगी हमें बहुत बड़ी सीख देने के लिए बहुत छोटी-सी चीज़ हमारे सामने रख देती है।
उस दिन वह चीज़ एक प्लास्टिक का पाउच था।
प्रो० (डा०) मो० शमीम अहमद
प्राचार्य
अल-इकरा शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय,सह चेयरमैन,क्रेसेंट इण्टरनेशनल स्कूल, गोविन्दपुर
धनबाद
मोबाइल नंबर 933404 9113
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