
सरायकेला खरसावां जिला के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र की आपबीती कहानी बयां करती है ,ईचागढ़ के स्वर्णरेखा नदी को सोने की चिढ़ाया के नाम से जाना जाता था।..? बहती नदी के तट पर… हाथ में कुदाल, खुरपी और लकड़ी की (फॉली) थाली। बहती नदी की धार के किनारे से पत्थर और मिट्टी निकालकर थाली में रखते हैं, फिर नदी के पानी से धोते हैं। मिट्टी-रेत को धोकर साफ करने के बाद उसमें से निकलता है खाटी सोना। जिसे चांडिल बाजार में सोनार के पास बेचकर ये देहाती मजदूर रोजाना तीन सौ से पांच सौ रुपया कमा पाते हैं।
कड़ी मेहनत के बाद गरीब आदिवासी अपने परिवार का जीवन-यापन करते हैं। उनकी जुबानी, आज 60 वर्षों से सुवर्णरेखा नदी के तट पर और बामनी नदी आदि जगहों पर सुबह से शाम तक कड़ी मेहनत करने के पश्चात इन लोगों को दिहाड़ी के तौर पर कभी 200 रुपये तो कभी 300-350 रुपये मिल जाते हैं।

सरकारी योजनाओं से वंचित होने और कोई रोजगार न मिलने के कारण ये लोग घर से खाना लेकर जाते हैं और कमरतोड़ मेहनत के बाद कच्चा सोना बेचकर कुछ रुपये कमा लेते हैं।

यह सिलसिला बारहों महीना चलता है। ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के गरीब आदिवासी लोग रोजगार के लिए चाहे गर्मी हो, बरसात हो या ठंड… हर मौसम में सोना निकालने में लगे रहते हैं।
अब यह देखना बाकी है कि सरकार इन परिवारों को स्वरोजगार से जोड़ पाती है या नहीं?
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