
सरायकेला: झारखंड में मॉनसून की दस्तक के साथ ही जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। सरायकेला जिले में धान की रोपनी का कार्य शुरू हो गया है, लेकिन किसानों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें अत्यधिक बारिश से चारा की कमी और ‘श्री विधि’ से खेती में लागत में वृद्धि प्रमुख हैं। इसके साथ ही, कई गरीब परिवारों के घर ढहने और उन्हें ‘अबुआ आवास’ या ‘पीएम आवास’ न मिलने से भी लोगों में भारी नाराजगी है।

‘श्री विधि’ से खेती में चुनौतियाँ

चालियामा गांव के किसान गोपाल सिंह ने बताया कि पहले बैल से हल जोतकर खेती करने से धान का अधिक उत्पादन होता था और गोबर खाद से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी। हालांकि, अब ‘श्री विधि’ के तहत बोरो धान के बीज और रासायनिक पदार्थ जैसे डीएपी, यूरिया और कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना पड़ता है, जिससे मुनाफा कम हो रहा है। किसानों का आरोप है कि कृषि विभाग द्वारा समय पर न तो प्रशिक्षण दिया जाता है और न ही बीज वितरित किए जाते हैं, जिसके कारण उन्हें निजी स्तर पर महंगे बीज और रसायन खरीदने पड़ रहे हैं।
ट्रैक्टर से जुताई का बढ़ता खर्च
किसानों को अब बैल की बजाय ट्रैक्टर से जुताई करानी पड़ रही है। पिछले दस वर्षों से ट्रैक्टर से खेत की जुताई हो रही है। साधारण जुताई के लिए प्रति घंटा ₹1100 से ₹1300 और रोटरी जुताई के लिए ₹1400 से ₹1600 प्रति घंटा का भुगतान ट्रैक्टर मालिकों को करना पड़ता है। धान की रोपनी की मजदूरी भी गांव के हिसाब से ₹120, ₹150 या ₹200 प्रतिदिन तक देनी पड़ती है, जिससे किसानों पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।
आशियाना विहीन हुए ग्रामीण, आवास योजनाओं पर सवाल
चालियामा पंचायत में भारी बारिश के कारण आदरी सिंह, कालीपद सिंह, उत्तम मंडल सहित दर्जनों लोगों के मकान ढह गए हैं। प्रदीप मंडल जैसे कई किसान भाइयों को मजबूरन अपने घरों पर तिरपाल लगाकर रहना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार द्वारा उन्हें न तो ‘अबुआ आवास’ और न ही ‘पीएम आवास’ उपलब्ध कराया गया है, जिससे वे ईश्वर के भरोसे तिरपाल लगाकर जीवन-यापन करने को विवश हैं।
बारिश की मार और बुवाई में देरी
कुछ किसानों ने अपने खेतों में धान की रोपनी शुरू कर दी है, जबकि कुछ किसानों के धान के चारा अभी तक निकले ही नहीं हैं। कई किसान अभी भी अच्छे रेट पर ललाट, सरन, हाइब्रिड और हजार 1 जैसे नए ब्रांड के धान के बीज खरीदकर बुवाई कर रहे हैं। कुछ ग्रामीण धान के बीजों को घरों में भिगोकर अंकुरित कर रहे हैं और फिर उन्हें खेतों में डाल रहे हैं। किसानों का कहना है कि जब बारिश की जरूरत होती है तब पानी नहीं बरसता, और जब बारिश होती है तो समय पर धान की बुवाई कर पाना मुश्किल हो जाता है। यह स्थिति किसानों के लिए ‘ईश्वर की मार’ जैसी है।
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