
*रांची/झारखंड /सरायकेला*: 7 मार्च आज पूरा देश ‘अनाज दिवस’ मना रहा है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य हमारी थाली तक पहुँचने वाले अन्न के महत्व को समझना है। लेकिन इस अवसर पर झारखंड के ग्रामीण इलाकों से जो चिंताएं सामने आ रही हैं, वे हमारी अर्थव्यवस्था और भविष्य के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं।

*खेतों का घटता दायरा और कंक्रीट का जाल*

आज हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले खेती-किसानी के क्षेत्र में भारी बदलाव आ रहा है। खेतों में अब अनाज की जगह बड़े-बड़े भवन और सीमेंट फैक्ट्रियाँ , रूंगटा माइंस खड़ी हो रही हैं। उपजाऊ जमीनें बंजर हो रही हैं या बेची जा रही हैं, जिसका सीधा असर अनाज और सब्जियों की कीमतों पर पड़ रहा है। आसमान छूती महंगाई इसी का परिणाम है।
*मजदूरों की कमी और सरकारी योजनाओं का प्रभाव*
ग्रामीण क्षेत्रों में एक नया संकट मजदूरों की उपलब्धता का है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि सरकारी योजनाओं, जैसे ₹1 किलो अनाज और ‘मैया योजना’ के तहत मिलने वाली ₹2500 की मासिक सहायता के कारण, मजदूर अब खेतों में मेहनत करने से कतरा रहे हैं। किसान अब बैलों की जगह ट्रैक्टरों पर निर्भर है, जिससे पशुधन धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।
*बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य पर वार*
हम ‘जंक फूड’ मैगी, चाऊमीन की चकाचौंध में असली पोषण को भूलते जा रहे हैं।
रागी, ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाज (Millets), जो कभी हमारी थाली की शान थे, अब गायब हो रहे हैं।
मोटे अनाज की कमी के कारण मधुमेह (Diabetes) और मोटापे जैसी बीमारियाँ पैर पसार रही हैं।
“अनाज केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि पोषण का पावरहाउस है। दलिया, ओट्स और बाजार हमारे पाचन तंत्र और हृदय को स्वस्थ रखने के लिए धन का काम करते हैं
एक तरफ शादियों और पाटियों में भारी मात्रा में अनाज की बर्बादी हो रही है तो दूसरी तरफ दुनिया में लोग भूखे सो रहे हैं वह उद्योग और खनन के विस्तार से पेड़ों की हरियाली की जगह धूल के कण जमा हो रहे हैं
आज राष्ट्रीय अनाज दिवस पर हमें यह संकल्प लेने की जरूरत है कि हम उनका सम्मान करेंगे अपनी खेती की जमीन को बचाएंगे और अपनी थाली में साबुत अनाज को वापस जगह देंगे। यदि आज हम नहीं चेते तो आने वाले पीढ़ी को केवल कंक्रीट के जगह जंगल और पोषण की कमी विरासत में मिलेगी।
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