
अहमदाबाद: गुजरात पुलिस के पूर्व कांस्टेबल बाबूभाई प्रजापति की कहानी आज हर किसी की आँखें नम कर रही है। महज़ 20 रुपये की कथित रिश्वत के जिस दाग को धोने के लिए उन्होंने अपनी ज़िंदगी के 30 साल अदालतों के चक्कर काटने में लगा दिए, उस कलंक के मिटने के ठीक 24 घंटे बाद उनकी धड़कनें थम गईं।

क्या था मामला? (1996 का वह ‘कलंक’)

बात साल 1996 की है, जब बाबूभाई पर एक ट्रक ड्राइवर से 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा था। यह रकम छोटी थी, लेकिन कानून की नज़र में यह भ्रष्टाचार था।
2004 में झटका: एक निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 4 साल की सजा सुनाई।
नौकरी और सम्मान का जाना: सजा के कारण उन्हें पुलिस विभाग से बर्खास्त कर दिया गया। उनकी वर्दी छिन गई और समाज में ‘भ्रष्ट’ होने का ठप्पा लग गया।
30 साल का कानूनी वनवास
बाबूभाई ने हार नहीं मानी और अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दशकों तक चली इस कानूनी लड़ाई ने उनकी जवानी, उनकी आर्थिक स्थिति और मानसिक शांति सब छीन ली। अंततः 4 फरवरी 2026 को जस्टिस एस. वी. पिंटो ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया और बाबूभाई को सभी आरोपों से बेगुनाह (बरी) घोषित कर दिया।
अंतिम समय: “दाग धुल गया, अब चैन है”
अपने वकील से मिलने के बाद बाबूभाई बहुत भावुक थे। उन्होंने खुशी जाहिर की थी कि अब वे दुनिया के सामने सिर उठाकर कह सकेंगे कि वे चोर नहीं थे। वकील के अनुसार, कोर्ट के फैसले से मिले सुकून और न्याय की उस चरम खुशी के अगले ही दिन उन्हें दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई।
विचारणीय बिंदु (Point of View):
न्याय में देरी: क्या 20 रुपये के मामले को सुलझाने और एक व्यक्ति को बेगुनाह साबित करने में 30 साल लगना उचित है?
सिस्टम की मार: जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी उम्र बेदाग होने की लड़ाई लड़ी, उसने अंततः जीत तो हासिल की, लेकिन उस जीत का जश्न मनाने के लिए उसके पास वक्त नहीं बचा।
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