
सरायकेला – सरायकेला के ग्रामीण तथा शहरी इलाकों में कुम्हारों के घरों में आगामी दीपावली को लेकर चहल-पहल बढ़ गई है।दीपावली प्रकाश, खुशियों और समृद्धि का त्योहार है। इस त्योहार की मूल पहचान मिट्टी के उन नन्हें दीयों से है, जो सदियों से हमारे आंगनों को रोशन करते आ रहे हैं। लेकिन आज आधुनिकता और चीनी (चाइनीज) लाइटों की चकाचौंध के बीच इन दीयों को बनाने वाले कुम्हार समाज के अस्तित्व पर गहरा संकट मंडरा रहा है। वहीं पिछले सप्ताह बारिश से फिर मौसम लगातार बादल से उनकी उम्मीदों पर असर पड़ रहा है।
कुम्हारों के लिए यह केवल कला नहीं, बल्कि साल भर की रोजी-रोटी और परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया है। महीनों पहले से मिट्टी जुटाना, उसे गूंथना, चाक पर आकार देना और फिर तपती भट्टी में पकाना—इस बेहद कठिन परिश्रम के पीछे उनका मकसद सिर्फ इतना होता है कि दीपावली पर उनके घर का चूल्हा भी जल सके।

जब हम एक स्थानीय कुम्हार से दीया खरीदते हैं, तो हमारा पैसा सीधे उस गरीब परिवार तक पहुंचता है। समाज का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह ‘वोकल फॉर लोकल’ (Vocal for Local) को केवल नारा न रहने दे, बल्कि इसे धरातल पर उतारे।

मिट्टी के दीये हमारी सनातन संस्कृति और परंपरा का हिस्सा हैं। चीनी लाइटों को अपनाकर हम अपनी ही कला को मार रहे हैं। समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा ताकि यह पारंपरिक हस्तशिल्प कला लुप्त न हो जाए।
मिट्टी के दीये पूरी तरह से इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल) होते हैं, जो प्रकृति में आसानी से मिल जाते हैं। इसके विपरीत, प्लास्टिक और बिजली की लड़ियां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। समाज में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव जागना जरूरी है।
स्थानीय कुम्हार पूर्ण चंद्र प्रजापति ने कहा बड़े-बड़े मॉल्स में बिना मोल-भाव किए हजारों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन सड़क किनारे बैठे कुम्हार से ₹१० के दीयों के लिए भी बहस कर मोल मुलाई करते हैं। समाज को अपनी इस मानसिकता को बदलना होगा। कुम्हार को उसकी मेहनत का सही दाम देना दया नहीं, बल्कि उसका अधिकार है।
प्रजापति ने कहा
“हम रात-दिन एक करके हजारों दीये तैयार करते हैं ताकि हमारे बच्चों को दो वक्त की रोटी और नए कपड़े मिल सकें। अगर समाज हमारे दीयों को नहीं खरीदेगा, तो हमारे घरों में अंधेरा रह जाएगा।”
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