
आज माता-पिता स्वयं शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करते हैं, लेकिन अपेक्षा करते हैं कि उनकी संतान धर्मपरायण, संस्कारी और सफल बने। जैसे शास्त्रों में कहा गया है — “बाढ़े पुत्र पिता के धर्मा, खेती बुझे अपन कर्मा” अर्थात् जैसे खेती अपने परिश्रम से लहलहाती है, वैसे ही संतान अपने माता-पिता के धर्म और कर्मों से आगे बढ़ती है। माता-पिता स्वयं मदिरापान, मांसाहार और अशोभनीय व्यवहार में लिप्त रहते हैं, परंतु चाहते हैं कि उनका पुत्र या पुत्री आदर्श, धर्मात्मा और सफल बने। हर मां-बाप को चाहिए कि वे अपने आचरण को शुद्ध करें और परिवार में प्रेम, संयम तथा धर्म का वातावरण बनाएं। जब माता-पिता स्वयं धर्म के मार्ग पर चलेंगे, तभी उनकी संतान सच्चे अर्थों में सुखी, सफल और संतुष्ट जीवन जी सकेगी।

जब तक जीवन में धर्म—अर्थात् सदाचार और कर्तव्यबोध—को स्थान नहीं दिया जाएगा, तब तक केवल भौतिक समृद्धि परिवार को एक नहीं रख सकती। आवश्यकता है कि घर में पुनः संस्कारों का दीप जलाया जाए, प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर-स्मरण, पारिवारिक संवाद और बड़ों के आशीर्वाद के लिए निकाला जाए। जब धर्म जीवन का आधार बनेगा, तब ही परिवारों में प्रेम, एकता और स्थायी सुख का वातावरण स्थापित होगा।

जिस घर में बड़े-बूढ़े प्रसन्न रहते हैं, वही घर सच अर्थों में उन्नति करता है। बुजुर्ग केवल परिवार के सदस्य नहीं होते, वे उस घर की जड़ और आधार होते हैं। उनके अनुभव, आशीर्वाद और जीवन की सीख परिवार को दिशा देती है। जब घर में बड़ों का सम्मान होता है, उनकी बात सुनी जाती है और उन्हें प्रेम व आदर दिया जाता है, तो वहाँ स्वाभाविक रूप से शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
बिना सत्संग के हमारे बच्चे संस्कारी नहीं बनेगे। सत्संग से बच्चों के भीतर श्रद्धा, विनम्रता, बड़ों का सम्मान, संयम और कर्तव्यबोध जैसे गुण विकसित होते हैं। जब वे संतों के वचन सुनते हैं, धर्मग्रंथों की कथाएँ जानते हैं और अच्छे लोगों की संगति में बैठते हैं, तो उनके मन में सही और गलत का स्पष्ट भेद उत्पन्न होता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी संतान सफल ही नहीं, बल्कि सदाचारी और संतुलित भी बने, तो हमें नियमित रूप से उन्हें सत्संग, प्रार्थना और सकारात्मक संगति से जोड़ना होगा। यही उनके उज्ज्वल और संतुलित भविष्य की सच्ची नींव है।यदि धार्मिक बनना चाहता है, तो भगवान के प्रति अटूट विश्वास होना चाहिए। विश्वास ही भक्ति की नींव है, क्योंकि बिना विश्वास के की गई भक्ति केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। जब भगवान पर ही भरोसा न हो, तो पूजा, पाठ और साधना का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।
हमें निरंतर नाम जाप करना चाहिए, क्योंकि नाम जाप में अद्भुत शक्ति समाहित है। नाम के स्मरण से मन को शांति मिलती है, विकार दूर होते हैं और जीवन की कठिन राह सरल बन जाती है। जहाँ नाम जाप होता है, वहाँ नकारात्मकता ठहर नहीं पाती और भीतर छिपी दिव्य शक्ति जागृत हो जाती है।
श्रीमद्भागवत कथा को श्रद्धा और भाव से ग्रहण करना चाहिए। श्रीमद्भागवत कथा से हृदय में भक्ति का संचार होता है। यह कथा आत्मा में उतारने की साधना है। इस दिव्य रस को प्राप्त करें और अपने जीवन को भक्तिरस से परिपूर्ण करें।इस कथा को सफल बनाने में विमल चन्द्र दे पट्टा दे, संजय अग्रवाल अनिता अग्रवाल, प्रदीप बंसल कांता बंसल सचिन दे सुमित मित्तल अजय कुमार दास आदि समस्त गोविंदपुर नगरवासीयो के सहयोग से किया जा रहा है।
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