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गोविंदपुर कुम्हारडीह रोड में पूज्य श्री सुरेन्द्र हरिदास जी महाराज के सानिध्य में श्रीमद्भागवत कथा का तृतीय दिवस 

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Mar 10, 2026

 

भगवान की कथा हमे जीवन में संयम सिखाती है, क्योंकि जीवन में सफलता और शांति दोनों के लिए आत्मनियंत्रण आवश्यक है। कथा भक्ति का भाव जगाती है, जिससे मन में नम्रता और करुणा का उदय होता है। जब हम कथा सुनते हैं, तो हमारे भीतर सकारात्मक विचारों का संचार होता है, नकारात्मकता दूर होती है और मन स्थिर होने लगता है।

 

अरावली ही नहीं, बल्कि भारत की सभी पर्वत श्रृंखलाओं को संरक्षित किया जाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से समझौता करना है। पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं होते; वे वर्षा के स्रोत हैं, नदियों के जनक हैं, वनस्पतियों और जीवों के आश्रय स्थल हैं। प्रकृति को भगवान का स्वरूप माना गया है ।

 

संसार में मनुष्य धन, पद और प्रतिष्ठा के पीछे भागता रहता है, परंतु वास्तविक धन वह है जो मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है—और वह है यश और कीर्ति। भारत माँ के वीर सपूत महाराणा प्रताप जैसा पौरुष होना चाहिए—जो विपरीत परिस्थितियों में भी कभी झुके नहीं, जिन्होंने कठिनाइयों में भी अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा को सर्वोपरि माना। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर संघर्ष का मार्ग चुना, क्योंकि उनके लिए सम्मान और धर्म किसी भी समझौते से बड़ा था। यही सच्चा साहस है, यही सच्चा पुरुषार्थ है।

 

भक्ति यदि करनी है तो वह ऐसी होनी चाहिए जैसी मीराबाई की थी—निष्काम, निडर और पूर्ण समर्पण से भरी हुई। मीरा ने समाज की बाधाओं, राजसी वैभव और आलोचनाओं की परवाह किए बिना केवल श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व माना। उनकी भक्ति में न दिखावा था, न स्वार्थ; केवल प्रेम था, समर्पण था और अटूट विश्वास था।

 

दान का भाव भामाशाह जैसी होनी चाहिए—जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अर्पित कर दिया। उनका दान केवल धन का दान नहीं था, बल्कि विश्वास और समर्पण का दान था। उन्होंने दिखाया कि सच्चा दानी वही है जो समय आने पर अपने संसाधनों को समाज और धर्म के लिए समर्पित कर दे।

 

अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा अवश्य दें और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। जिस बच्चे के जीवन में धर्म का आधार होता है, उसका चरित्र मजबूत होता है। वह सही और गलत का अंतर समझता है, बड़ों का आदर करता है, छोटों से प्रेम करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखता है। धर्म जीवन को दिशा देता है, अनुशासन सिखाता है और कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।

 

मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग बच्चों और युवाओं के लिए के काफी हानिकारक है। इससे पढ़ाई में ध्यान कम होना, एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत का रूप ले लेती है, जिससे व्यक्ति वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों से दूर होने लगता है। मोबाइल साधन है, साध्य नहीं। इसका उपयोग सीमित और आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए।

 

आज बहुत सारे लोग हमारे धर्माचार्यों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं, हमारे हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करते हैं, हमारे पवित्र ग्रंथों जैसे रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता पर कटाक्ष करते हैं। ये सब बंद होना चाहिए। देश में एक कानून बनना चाहिए कि जो भी ऐसे कृत्य करता है उनको कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए।

बचपन से कथा सुनना अत्यंत आवश्यक और कल्याणकारी माना गया है। जिस प्रकार छोटे पौधे को सही दिशा और सहारा मिल जाए तो वह मजबूत वृक्ष बनता है, उसी प्रकार यदि बच्चों को बचपन से ही धर्म, संस्कार और भगवान की कथाएँ सुनाई जाएँ, तो उनका चरित्र दृढ़ और श्रेष्ठ बनता है। रामायण, भागवत या संतों की कथाएँ बच्चों में सत्य, करुणा, आज्ञाकारिता और परोपकार जैसे गुण विकसित करती हैं। इससे उनका मन सकारात्मक बनता है और वे सही-गलत की पहचान करना सीखते हैं।

हर सनातनी को माथे पर तिलक अवश्य धारण करना चाहिए। तिलक मात्र एक चिह्न नहीं, बल्कि सनातनियों का श्रृंगार है। यह व्यक्ति को निरंतर बोध कराता है कि उसका जीवन धर्म, मर्यादा और सदाचार के मार्ग पर अडिग रहे। कलावा ,तिलक और तुलसी सनातन की पहचान है इसे सभी सनातनियों को धारण करना चाहिए।

कभी भी किसी दूसरे को दुःख नहीं देना चाहिए। कई बार अनजाने में कही गई कठोर बात भी किसी के हृदय को आहत कर सकती है। इसलिए हमेशा सोच-समझकर बोलना और व्यवहार करना चाहिए। मानवता का मूल सिद्धांत ही यही है कि हम दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा हम अपने लिए चाहते हैं। दया, करुणा और सहानुभूति जीवन को सुंदर बनाती हैं। जो व्यक्ति दूसरों को सुख देने का प्रयास करता है, उसके जीवन में भी सुख और शांति स्वतः आने लगती है।

सूर्य को नित्य जल चढ़ाना अत्यंत शुभ और कल्याणकारी माना गया है। सनातन परंपरा में सूर्यदेव को साक्षात् प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, क्योंकि वे हमें प्रकाश, ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। प्रातःकाल स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य को अर्घ्य देने से शरीर, मन और आत्मा में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कथा पंडाल में सदैव मर्यादा में रहना चाहिए। अनावश्यक बातचीत करना, इधर-उधर ध्यान भटकाना या दूसरों का ध्यान भंग करना उचित नहीं है। संतों की वाणी अमृत के समान होती है, और यदि हम मन, वचन और कर्म से शांत रहकर उसे ग्रहण करें, तभी उसका पूर्ण लाभ हमें प्राप्त होता है।

बातचीत करने से न केवल हमारा ध्यान भटकता है, बल्कि हमारे आसपास बैठे श्रद्धालुओं की साधना में भी बाधा उत्पन्न होती है। यह स्थान मनोरंजन का नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का होता है।।इस कथा को सफल बनाने में विमल चन्द्र दे पट्टा दे, संजय अग्रवाल अनिता अग्रवाल, प्रदीप बंसल कांता बंसल सचिन दे,निवरनं दास, सुमित मित्तल अजय कुमार दास आदि समस्त गोविंदपुर नगरवासीयो के सहयोग से किया जा रहा है।


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