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आसनबनी में सेल के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश मार्च: “मर जाएंगे किंतु जमीन नहीं देंगे”

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Byadmin

Jul 13, 2025

 

 

 

बलियापुर: शुक्रवार को आसनबनी में सेल (SAIL) टासरा द्वारा अधिग्रहित की गई जमीन पर कब्जा दिलाने पहुंची पुलिस प्रशासन और सेल कंपनी के अधिकारियों द्वारा रैयत ग्रामीणों पर किए गए लाठीचार्ज के विरोध में आज रविवार शाम को आसनबनी में प्रभावित रैयत किसानों और ग्रामीणों ने एक विशाल आक्रोश मार्च और मशाल जुलूस निकाला। इस घटना ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है, जहां ग्रामीण अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए दृढ़ संकल्पित दिख रहे हैं।

 

जुलूस में शामिल महिला और पुरुषों ने सरसाकुंडी, आसनबनी और आसपास के गांवों का भ्रमण किया। उनके हाथों में मशालें थीं और उनकी आवाज में गुस्सा साफ झलक रहा था। रैली में शामिल लोग जिला पुलिस प्रशासन और सेल प्रबंधन के खिलाफ जोरदार नारे लगा रहे थे, जिनमें “पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद,” “सेल प्रबंधन होश में आओ,” और “किसानों पर लाठीचार्ज बंद करो” जैसे नारे प्रमुख थे।

 

इस विरोध प्रदर्शन का मुख्य बिंदु सरिसा कुंडी मोड़ पर हुआ, जहां प्रदर्शनकारियों ने सेल कंपनी टासरा के महाप्रबंधक एस.के. कुरूल का पुतला दहन किया। यह प्रतीकात्मक विरोध इस बात का स्पष्ट संदेश था कि ग्रामीण सेल प्रबंधन की नीतियों और उनके खिलाफ हुई कार्रवाई से कितने नाराज हैं। पुतला दहन के दौरान “तानाशाही नहीं चलेगी,” और “किसानों का उत्पीड़न बंद करो” जैसे नारे गूंज रहे थे।

 

आक्रोश रैली में शामिल रैयत किसान विशेष रूप से “मर जाएंगे किंतु जमीन नहीं देंगे” का नारा लगा रहे थे, जो उनकी जमीन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और किसी भी कीमत पर उसे न छोड़ने के उनके संकल्प को दर्शाता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह उनकी आजीविका और पहचान का सवाल है, और वे अपनी जमीन बचाने के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे।

 

इस आक्रोश रैली में अमृत महतो, विकास ठाकुर, अनिल मांझी, राहुल कुमार, सुनील मांझी, अनिल महतो, मंसाराम माझी, सोनाराम महतो, शत्रुघ्न महतो, नीलू देवी, बिजली देवी, राबड़ी देवी, नकुल महतो, विकास महतो, मनोज महतो, इंद्रजीत महतो समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल थे। इन सभी ने एक स्वर में सेल और प्रशासन की कार्रवाई की निंदा की और न्याय की मांग की।

 

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो वे भविष्य में और भी बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। यह घटना भूमि अधिग्रहण के मुद्दों और स्थानीय समुदायों पर इसके प्रभाव को उजागर करती है, और प्रशासन तथा कंपनियों के लिए यह एक चुनौती है कि वे विकास परियोजनाओं को स्थानीय लोगों के अधिकारों और चिंताओं का सम्मान करते हुए कैसे आगे बढ़ाएं।


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