

सरायकेला-खरसावां जिला के चांडिल अनुमंडल स्तरीय सार्वजनिक टुसू मिलन समारोह-2026 का भव्य शुभारंभ गुरुवार को एनएच-32 बाईपास रोड, चांडिल स्टेशन के समीप किया गया। दो दिवसीय विराट टुसू मेला एवं विशाल मुर्गा लड़ाई का उद्घाटन भाजपा नेता सह समाजसेवी राकेश वर्मा एंब विश्वरंजन महतो संस्थापक संयुक्त रूप से फीता काटकर उद्घाटन किया।

यह पारंपरिक मेला बंगला कैलेंडर के माघ महीने की 8 और 9 तारीख, यानी गुरुवार और शुक्रवार को आयोजित किया जा रहा है। गुरुवार को मेले का पहला दिन रहा। उल्लेखनीय है कि इस टुसू मेले की शुरुआत को अब 19 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं, और यह मेला क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुका है।

मेला समिति की ओर से गुरुजनों, भाइयों, माताओं एवं बहनों से अपील की गई है कि वे पूर्वजों की सांस्कृतिक परंपरा और पहचान को जीवित रखने के लिए सुसज्जित रूप में हजारों की संख्या में उपस्थित होकर मेले को सफल बनाएं, ताकि आने वाली नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जुड़ने की प्रेरणा मिल सके।
मेले के दौरान टुसू प्रतिमा और चौड़ल प्रतियोगिता का आयोजन रखा गया है, जिसमें प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वालों को आकर्षक पुरस्कार दिए जाएंगे। वहीं, मेले में शामिल सभी टुसू और चौड़ल प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा।
उद्घाटन अवसर पर भाजपा नेता सह समाजसेवी राकेश वर्मा ने कहा कि टुसू मेला सदियों से चली आ रही हमारी सांस्कृतिक परंपरा है। इस परंपरा को निभाना हमारी जिम्मेदारी है, क्योंकि परंपराओं का समाप्त होना अपनी पहचान और अस्तित्व को खोने जैसा है। हमारी असली पहचान हमारी संस्कृति में निहित है। उन्होंने हर वर्ष इस मेले के सफल आयोजन के लिए मेला समिति को धन्यवाद एवं साधुवाद दिया।
विश्वरंजन महतो मेला का संस्थापक ने कहा हिन्दुओं के लिए मकर संक्रांति बहुत ही पवित्र दिन है। भारत देश में मकर संक्रांति अलग अलग नाम से जाना जाता है लेकिन झारखण्ड में टुसू परब के नाम से मनाया जाता है। मकर संक्रांति के पवित्र स्नान के बाद से ही क्षेत्र में जगह जगह मेले का आयोजन किया जाता है। झारखंड में टुसू परब को आदिवासी मूलवासी धूम धाम से इस त्यौहार को मनाते है। इसका एक नाम माघे परब भी है विशेषकर हमारे संथाल भाइयों का कोल भाइयों का पहले एक परब लगता था जिसमें शादी का शुभारंभ होता था। मेले में लड़की को ले जाकर शादी करते थे। यह एक परम्परा है। हमलोग टुसू के माध्यम से संस्कृति को बचाते हैं। और झारखंड किसी भाषा का राज्य नहीं है बाकी देश के राज्यों के जैसा। झारखंड की लड़ाई सांस्कृतिक थी। नगाड़ा का थाप, मादोल , झांवा नाच, करम नाच, संथाली नाच, ।
स्थानीय स्तर पर यह मेला ‘कार्तिक मेला’ के नाम से भी जाना जाता है और इसे ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। मेला क्षेत्र में उत्सव, उल्लास और पारंपरिक रंग साफ तौर पर देखने को मिल रहे हैं।
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