
नगर निकाय चुनाव की सरगर्मी के बीच संजीव सिंह का मेयर पद के लिए नामांकन एक बड़ा मोड़ लेकर आया है। 3 फरवरी को आनन-फानन में बुलाई गई प्रेसवार्ता में संजीव सिंह ने न केवल अपनी उम्मीदवारी स्पष्ट की, बल्कि चुनाव के स्वरूप को लेकर एक नई बहस भी छेड़ दी है।आज संजीव सिंह 4 फरबरी को अपना नामांकन दाखिल करेंगे.

*गैर-राजनीतिक चुनाव: समर्थकों का दबाव या रणनीतिक कदम?*

संजीव सिंह ने पत्रकारों से बात करते हुए सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह दिया कि चूंकि यह चुनाव गैर-राजनीतिक है और इसमें कोई आधिकारिक पार्टीगत उम्मीदवार मैदान में नहीं है, इसलिए उन्होंने समर्थकों के ‘दवाब और आग्रह’ को स्वीकार किया है। यह बयान उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा जान पड़ता है। किसी पार्टी के सिंबल पर न लड़कर, वे खुद को सीधे जनता के प्रतिनिधि के रूप में पेश कर रहे हैं, जिससे उन्हें हर विचारधारा के लोगों का समर्थन मिलने की संभावना बढ़ गई है।
*पार्टी निष्ठा बनाम व्यक्तिगत छवि*
अब तक के चुनावों में अक्सर पार्टी की लहर व्यक्तिगत योग्यता पर भारी पड़ती रही है, लेकिन संजीव सिंह की एंट्री ने इस समीकरण को बदल दिया है। इस बार मुकाबला ‘पार्टी कार्ड’ पर नहीं, बल्कि ‘व्यक्तिगत प्रभाव’ और जन-आधार पर टिका है। सिंह के प्रति उमड़ता जनसैलाब यह संकेत दे रहा है कि जनता अब स्थानीय विकास के लिए चेहरों की पहचान उनकी पार्टी से ऊपर उठकर कर रही है।
*चुनाव का ‘बड़ा फैक्टर*
‘
जिस तरह से लोगों का समर्थन संजीव सिंह को मिल रहा है, उससे स्पष्ट है कि वे इस चुनाव के सबसे बड़े ‘गेम चेंजर’ बनकर उभरे हैं। यदि वे इस जनसमर्थन को वोटों में तब्दील करने में सफल रहते हैं, तो यह परिणाम भविष्य के स्थानीय चुनावों के लिए एक नजीर पेश करेगा कि स्थानीय मुद्दों पर व्यक्तिगत साख ही सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार है।
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