
चांडिल, झारखंड: त्याग और बलिदान का प्रतीक पवित्र त्योहार ईद-उल-अज़हा, जिसे बकरीद भी कहा जाता है, चांडिल अनुमंडल के विभिन्न गांवों – झिमड़ी, सिंदुरपुर, मुरु, तिरुलडीह, और चौड़ा में सादगी और शांतिपूर्ण ढंग से मनाया गया। यह पर्व हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम के महान त्याग और समर्पण की याद दिलाता है।

शनिवार को सुबह से ही मुस्लिम समुदाय के लोग बड़ी संख्या में ईदगाहों और मस्जिदों में नमाज अदा करने के लिए उमड़ पड़े। झिमड़ी, सिंदुरपुर, और मुरु गांव में सुबह 7:00 बजे से ही ईदगाहों में नमाज अदा की गई। मौलानाओं ने अल्लाह की इबादत कराई और समाज में अमन व भाईचारे का संदेश दिया। कुकड़ू प्रखंड क्षेत्र के तिरुलडीह और चौड़ा में भी पूरे उत्साह और सादगी के साथ बकरीद मनाई गई, जहां मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मस्जिदों और ईदगाहों में सामूहिक रूप से नमाज़ अदा की।

नूरी मस्जिद, तिरुलडीह में पेशे इमाम कारी समीउल्लाह ने अकीदत के साथ नमाज़ अदा करवायी और देश में अमन, चैन और तरक्की की दुआ मांगी। उन्होंने बताया कि बकरीद का त्योहार हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत को याद करते हुए मनाया जाता है, जिसमें मुस्लिम समुदाय कुर्बानी की परंपरा निभाता है। इस मौके पर समुदाय के लोगों ने अपने घरों में कुर्बानियां पेश कीं और सामाजिक एकता का संदेश दिया।
ईद-उल-फितर के लगभग 70 दिन बाद ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनाई जाने वाली बकरीद, मुस्लिम समुदाय के लिए विशेष महत्व रखती है। यह त्योहार न केवल बलिदान की भावना को दर्शाता है, बल्कि भाईचारे और परोपकार को भी बढ़ावा देता है।
पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी
नीमडीह थाना के झिमड़ी, सिंदुरपुर, मुरु और तिरुलडीह थाना के तिरुलडीह, चौड़ा गांव में पुलिस प्रशासन विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर प्रकार से सतर्क था। सुबह से ही ईदगाहों और मस्जिदों के आसपास सुरक्षा बलों की तैनाती रही, जिसके चलते यह पर्व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। नूरी मस्जिद, तिरुलडीह के सदर असगर अली अंसारी ने शांतिपूर्ण आयोजन के लिए पुलिस-प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया।
नमाज के बाद लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद दी और समाज में शांति एवं खुशहाली की दुआ मांगी। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों के चेहरों पर ईद की रौनक साफ दिखाई दी। मिठाइयों का आदान-प्रदान कर लोगों ने आपसी एकता को मजबूती दी। यह पर्व त्याग, समर्पण और भाईचारे का प्रतीक है, और इस दिन लोग पशु की कुर्बानी देकर अल्लाह की राह में सेवा का संदेश देते हैं।
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