
हजारीबाग, झारखंड: अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) ने बुधवार को हजारीबाग में एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर झारखंड में भूमि अधिग्रहण और विस्थापन से संबंधित ज्वलंत मुद्दों पर केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए। एआईकेएस के राष्ट्रीय सचिव के.डी. सिंह और प्रदेश अध्यक्ष तथा झारखंड विस्थापित संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष व पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता ने संयुक्त रूप से विस्थापितों की समस्याओं और भूमि की “लूट” पर अपनी चिंता व्यक्त की।

के.डी. सिंह ने कहा कि झारखंड राज्य के गठन को 24 वर्ष बीत जाने के बावजूद, अब तक न तो कोई समुचित विस्थापन और पुनर्वास नीति बन पाई है, और न ही भूमि अधिग्रहण कानून 2013 को सही ढंग से लागू किया गया है। उन्होंने दुख व्यक्त करते हुए कहा, “झारखंड का विस्थापन झारखंड का अभिशाप बन गया है।” सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि विस्थापन का सबसे अधिक दंश दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोगों को झेलना पड़ रहा है।

पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता ने केंद्र सरकार की किसान और मजदूर विरोधी नीतियों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा किए जा रहे भूमि अधिग्रहण से सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब, दलित और आदिवासी किसान हो रहे हैं। मेहता ने बताया कि सरकारी व निजी उपक्रमों की परियोजनाओं के कारण हजारों गांव उजड़ चुके हैं, लेकिन किसानों को न तो समुचित मुआवजा मिला, न रोजगार, और न ही पुनर्वास की व्यवस्था की गई।
मेहता ने तत्कालीन रघुवर दास सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकी सरकार ने कई किसानों की जोताई वाली जमीन को भूमि बैंक में डाल दिया, और लगान की रसीद काटने के बावजूद नाम दर्ज नहीं किया। उन्होंने उन गैर-मजरूवा जमीनों का भी जिक्र किया, जिन पर किसानों का वर्षों से हक और दखल कब्जा था और वे उन पर खेती करके अपने परिवार का जीविकोपार्जन कर रहे थे। ऐसी जमीनों को भी कब्जे में ले लिया गया, जिससे किसान पूरी तरह बेरोजगार और बेघर हो गए। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी उनके वादे से मुकरने का आरोप लगाया, जिन्होंने भूमि बैंक से किसानों की जमीन वापस दिलाने का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कुछ नहीं किया।
मेहता ने बताया कि सरकार द्वारा लगातार भूमि अधिग्रहण के कारण अब तक लगभग 45 लाख किसान विस्थापित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के पास विस्थापन की भयावहता का अंदाजा लगाने के लिए कोई समुचित आंकड़ा तक नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और बिचौलियों की मदद से झारखंड की निजी कंपनियां भी किसानों की जमीनों को “लूट” रही हैं।
*अखिल भारतीय किसान सभा ने सरकार से निम्नलिखित मांगें की हैं:*
झारखंड में विस्थापन बंद हो।
कोयला या अन्य खनिजों के उपकरणों के निर्माण एवं खनन में किसानों की भागीदारी व हिस्सेदारी सुनिश्चित हो।
आदिवासी, दलित और किसानों की जमीन का अधिग्रहण न हो।
गोंदलपूरा कोल ब्लॉक रद्द किया जाए।
किसानों के नाम बंदोबस्त गैर-मजरूवा जमीन को रिलीज कर किसानों को वापस दिलाई जाए।
झारखंड में विस्थापन आयोग का गठन हो ताकि पूर्व के विस्थापितों का लेखा-जोखा हो सके।
मेहता ने स्पष्ट किया कि जब तक ये मांगें पूरी नहीं होंगी, यह संघर्ष जारी रहेगा। इस मौके पर खतियानी परिवार के केंद्रीय महासचिव मोहम्मद हकीम अंसारी, श्रीकांत मेहता, कामरेड इम्तियाज अंसारी, कामरेड तुलसी कुमार, कामरेड अनंत कुमार आर्या, सुनीता कुमारी, कामरेड मजीद अंसारी सहित कई वामपंथी और आंदोलनकारी नेता उपस्थित थे।
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