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सरायकेला: दलमा की जर्जर सड़क बनी मुसीबत, पर्यटक और ग्रामीण परेशान; करोड़ों के राजस्व पर सवाल

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Jul 7, 2025

 

सरायकेला: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के चाकुलिया गांव के पास स्थित दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की ओर जाने वाली सड़क की हालत बेहद खराब है. सड़क पर जगह-जगह गड्ढे और पानी भर जाने से बाइक सवार पर्यटकों के गिरने की घटनाएं आम हो गई हैं. स्थानीय ग्रामीणों को डर है कि आगे चलकर कोई बड़ा हादसा हो सकता है. इस समस्या के कारण सड़क की खराब स्थिति और गड्ढों में पानी भर जाने से यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है.

 

राजस्व के बावजूद सुविधाओं का अभाव

दलमा सेंचुरी से प्रतिमाह 2 लाख रुपये से अधिक का राजस्व मिलता है. वन विभाग द्वारा पर्यटकों से सफारी के लिए 2800 रुपये, म्यूजियम में प्रवेश के लिए 100 रुपये, प्राइवेट गाड़ी के लिए 600 रुपये और प्रति व्यक्ति 10 रुपये का शुल्क लिया जाता है. इसके बावजूद, पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बुनियादी सुविधाओं का अभाव झेलना पड़ रहा है.

 

मकुलकोचा चेक नाका मुख्य गेट पर स्थित लगभग 70 लाख रुपये की लागत से बने लकड़ी के ‘इन्फॉर्मेशन कियोस्क सह स्मारिका दुकान’ की भी मेंटेनेंस की कमी के कारण हालत जर्जर हो गई है. हाल ही में, एक पर्यटक का पैर लकड़ी के फर्श में धंस गया, जिसके बाद उस स्थान पर रिंग की जाली लगाई गई. यह 70 लाख रुपये की लागत से बनी संरचना कुछ ही वर्षों में चर्चा का विषय बन गई है, जबकि दलमा वन के पदाधिकारी इस पर मौन साधे हुए हैं.

 

ग्रामीण और पर्यटक दोनों प्रभावित

नीमडीह थाना क्षेत्र के चालियामा, फाड़ेगा, बांधडीह और बोड़ाम प्रखंड के ग्रामीण प्रतिदिन इस सड़क का उपयोग करते हैं. फिसलन भरे रास्ते और कीचड़ के कारण लोगों को आवाजाही में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. दूरदराज से आने वाले पर्यटकों को भी सड़क की खराब स्थिति के कारण परेशानी होती है.

 

वशिष्ठ सिंह और बाबूराम किस्कू ने बताया कि वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा दलमा को इको सेंसेटिव जोन घोषित किए जाने के बाद इस क्षेत्र में विकास होना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय आदिवासी समुदाय के लोगों को डरा-धमकाकर विकास के नाम पर कुछ नहीं किया जा रहा है.

 

सावन में बढ़ती भीड़ और भविष्य की चिंता

जल्द ही सावन का महीना आने वाला है, जब पावन अवसर पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु और भक्त दलमा बूढ़ा बाबा के नाम से प्रसिद्ध गुफा के अंदर स्थित मंदिर में दर्शन, पूजा-अर्चना और जलाभिषेक करने के लिए पहुंचते हैं. पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के विभिन्न कोनों से श्रद्धालु यहां आते हैं. सड़क की यह खराब स्थिति देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजस्व के नाम पर केवल “लूट-खसोट” हो रहा है.

 

इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम पर लोगों को रोजाना लूटा जा रहा है. जंगल से हाथी और विभिन्न जीव-जंतु पलायन कर चुके हैं. एक दर्शक ने बताया कि आज से पांच साल पहले जलाशयों में हाथियों के झुंड देखने को मिलते थे, लेकिन अब इक्का-दुक्का हाथी ही नजर आते हैं. गज परियोजना के तहत प्रति वर्ष करोड़ों रुपये केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मुहैया कराए जाते हैं, लेकिन हाथियों के झुंड पलायन कर चुके हैं और अब ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाले हुए हैं.

 

प्रशासन को इस समस्या का समाधान करने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए, ताकि पर्यटकों और ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. वन एवं पर्यावरण विभाग को क्षेत्र में विकास कार्यों को गति देनी चाहिए और इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए, जिससे दलमा की तराई में बसे बहुल आदिवासी समुदाय के शिक्षित युवकों को स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ा जा सके और रोजगार प्रदान किया जा सके.

 

 


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