
धनबाद: बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय (बीबीएमकेयू) में उस समय रोजगार का मुद्दा गरमा गया जब विश्वविद्यालय की एक आउटसोर्सिंग कंपनी समानता ने कथित तौर पर पिछले दो वर्षों से कार्यरत 30 स्थानीय ग्रामीण चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को अचानक नौकरी से हटा दिया। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब विश्वविद्यालय में विनोद बाबू की आदमकद प्रतिमा का अनावरण होने वाला है, जिसमें महामहिम राज्यपाल और माननीय मुख्यमंत्री के शामिल होने की संभावना है।

स्थानीय ग्रामीणों को नौकरी से निकाले जाने की खबर ने क्षेत्र में आक्रोश और निराशा का माहौल पैदा कर दिया है। इन कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या उचित कारण के नौकरी से निकाल दिया गया, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का सवाल है कि क्या विनोद बाबू, जिनके नाम पर यह विश्वविद्यालय स्थापित है, का सपना स्थानीय लोगों को रोजगार और सम्मानजनक जीवन देने का था, और क्या यह सपना अब अधूरा रह जाएगा?

इस मुद्दे पर तब और अधिक चिंता बढ़ गई जब स्थानीय लोगों ने महामहिम राज्यपाल, माननीय मुख्यमंत्री और धनबाद के माननीय सांसद एवं विधायकों से इस मामले में हस्तक्षेप करने और उनकी आवाज उठाने की अपील की। ग्रामीणों का कहना है कि जब प्रदेश के मुखिया और अन्य जनप्रतिनिधि विश्वविद्यालय में विनोद बाबू की प्रतिमा का अनावरण करने आ रहे हैं, तो क्या वे इन बेरोजगार हुए स्थानीय लोगों की पीड़ा पर ध्यान देंगे या नहीं? क्या वे समानता आउटसोर्सिंग कंपनी की इस मनमानी कार्रवाई पर कोई सवाल उठाएंगे और इन कर्मचारियों को न्याय दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे?
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि बीबीएमकेयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में, जो कि स्थानीय करों और संसाधनों से चलता है, स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आउटसोर्सिंग कंपनियों द्वारा इस तरह से मनमाने ढंग से कर्मचारियों को निकालना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी हानिकारक है।
अब सबकी निगाहें कल होने वाले प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम पर टिकी हैं। क्या महामहिम राज्यपाल और माननीय मुख्यमंत्री इस गंभीर मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ेंगे? क्या वे स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार सुरक्षा का आश्वासन देंगे? क्या विनोद बाबू का सपना, जो इस क्षेत्र के लोगों के विकास और उत्थान का सपना था, साकार हो पाएगा? यह वह सवाल है जिसका जवाब धनबाद के स्थानीय ग्रामीण बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
यह घटना न केवल उन 30 बेरोजगार कर्मचारियों के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों और आउटसोर्सिंग कंपनियों की कार्यशैली पर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। देखना यह होगा कि क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस मामले में संज्ञान लेते हैं और इन स्थानीय ग्रामीणों को न्याय दिलाने के लिए कोई सार्थक कदम उठाते हैं या नहीं।
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