
केंद्र सरकार ने भारतीय ऊर्जा क्षेत्र की दिशा बदलने वाला एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिसके तहत अब देश के कोयला क्षेत्र में कोयले की खोज, खनन योजना और डिजाइन तैयार करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में निजी कंपनियों को आधिकारिक तौर पर प्रवेश दे दिया गया है।

इस निर्णय के साथ ही कोयला क्षेत्र में पिछले लगभग पांच दशकों से निर्बाध रूप से चले आ रहे सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट (CMPDI) के एकाधिकार का अंत हो गया है।

वर्ष 1973 में अपनी स्थापना के बाद से CMPDI ही देश की एकमात्र सरकारी संस्था थी जो सभी कोयला परियोजनाओं की रूपरेखा और तकनीकी ब्लूप्रिंट तैयार करती थी। अब पहली बार यह क्षेत्र एक प्रतिस्पर्धी ढांचे में प्रवेश कर रहा है, जहां सरकारी और निजी कंपनियां कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगी।
सरकार की इस पहल के तहत अब तक कुल 44 निजी कंपनियों को कोयला एवं लिग्नाइट की खोज और माइनिंग प्लानिंग के लिए अधिसूचित किया गया है। यह प्रक्रिया दो सुव्यवस्थित चरणों में पूरी की गई है।
प्रथम चरण की शुरुआत 26 नवंबर 2025 को हुई थी, जब 18 निजी कंपनियों को इस कार्य के लिए हरी झंडी दी गई थी। इसके ठीक बाद, 28 जनवरी 2026 को दूसरे चरण में 26 और कंपनियों को इस सूची में शामिल किया गया। इन कंपनियों का चयन राष्ट्रीय स्तर पर किया गया है, जिसमें झारखंड की टाटा स्टील लिमिटेड और जेम्स प्रोजेक्ट्स से लेकर पश्चिम बंगाल की इंडियन माइन प्लानर्स, हरियाणा की मैट्रिक्स माइनिंग, और दक्षिण भारत की एपीसी ड्रिलिंग जैसी अनुभवी फर्में शामिल हैं।
इन कंपनियों में महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और मेघालय जैसे राज्यों की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि देश के हर भौगोलिक हिस्से में कोयला खनन की प्रक्रिया को स्थानीय और विशेषज्ञ स्तर पर गति मिल सके।
कोयला मंत्रालय के अनुसार, इस निजी भागीदारी का सबसे बड़ा लाभ परियोजनाओं की गति और आधुनिक तकनीक के समावेश के रूप में देखने को मिलेगा। अब तक कोयला ब्लॉकों की खोज और उनकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने में लगने वाला लंबा समय परियोजनाओं के क्रियान्वयन में बड़ी बाधा बना रहता था।
निजी कंपनियों के आने से न केवल अत्याधुनिक ‘ड्रिलिंग’ और ‘जियोलॉजिकल मैपिंग’ की तकनीकों का इस्तेमाल होगा, बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के कारण कार्यों को पूरा करने की समय-सीमा में भी भारी कमी आएगी। यह कदम प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अनुरूप है, क्योंकि घरेलू कोयला उत्पादन में तेजी आने से विदेशी कोयले पर देश की निर्भरता कम होगी और अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
इस बदलाव का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी विशेषज्ञता का आदान-प्रदान है। निजी कंपनियां अक्सर वैश्विक मानकों और नवीन पद्धतियों का अनुसरण करती हैं,
जिनका लाभ अब भारतीय खदानों को मिलेगा। इससे खनन के दौरान होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करने और सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने में भी मदद मिलेगी। 44 कंपनियों की इस विशाल सूची में माई वर्ल्ड कंसल्टेंसी, वरदान एनवायरनेट,
और जियो एक्सप्लोरेशन जैसी संस्थाओं का होना यह दर्शाता है कि सरकार केवल खनन ही नहीं, बल्कि पर्यावरण नियोजन और वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर भी विशेष ध्यान दे रही है। अंततः, यह ऐतिहासिक फैसला भारतीय माइनिंग सेक्टर को एक अधिक पारदर्शी, तीव्र और परिणामोन्मुखी उद्योग के रूप में स्थापित करेगा, जो आने वाले वर्षों में देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होगा।
There is no ads to display, Please add some


Post Disclaimer
स्पष्टीकरण : यह अंतर्कथा पोर्टल की ऑटोमेटेड न्यूज़ फीड है और इसे अंतर्कथा डॉट कॉम की टीम ने सम्पादित नहीं किया है
Disclaimer :- This is an automated news feed of Antarkatha News Portal. It has not been edited by the Team of Antarkatha.com
