
बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) में अनियमितताओं के गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मतदाताओं को अपने द्वारा जमा किए गए आवेदन पत्रों की प्रति नहीं मिल रही है, जो एक बुनियादी अधिकार है और भविष्य में किसी भी विसंगति की स्थिति में उनके पास सबूत के अभाव का कारण बन सकता है।

इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) कथित तौर पर अनाड़ी और कम पढ़े-लिखे मतदाताओं की ओर से थोक में आवेदन भर रहे हैं। यह प्रक्रिया मतदाताओं की स्वतंत्र इच्छा और उनकी जानकारी के बिना होने की आशंका पैदा करती है, जिससे मतदाता सूची में गलत नामों के जुड़ने या हटाने की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार की धांधली न केवल चुनावी नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता को भी भंग करती है।

इन आरोपों के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय ने इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। न्यायालय का यह निर्णय महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि प्रक्रिया जारी रहेगी, जबकि आरोपों की जांच और सत्यापन अभी भी आवश्यक है। यह स्थिति उन लोगों के लिए चिंता का विषय है जो एक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करना चाहते हैं।
इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों को इस मामले की गहन जांच करनी चाहिए। मतदाताओं को उनके आवेदन पत्रों की प्रति उपलब्ध कराना और यह सुनिश्चित करना कि BLO अपनी शक्तियों का दुरुपयोग न करें, आवश्यक है। एक विश्वसनीय मतदाता सूची ही निष्पक्ष चुनावों का आधार होती है, और इस पर उठ रहे सवाल लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इन शिकायतों का समाधान किया जाए ताकि बिहार में आगामी चुनावों की विश्वसनीयता बनी रहे।
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