
नई दिल्ली: पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 26 दिसंबर यानी गुरुवार की रात दिल्ली के एम्स में आखिरी सांस ली. उन्हें आर्थिक उदारीकरण के जनक के रूप में जाना जाता है. दरअसल, 1991 में जब भारत आर्थिक संकट से गुजर रहा था. उस वक्त उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला और देश की इकोनॉमी को नई दिशा दी और अपने फैसलों से भारत को आर्थिक मोर्चे पर मजबूत किया.

जिस समय वह वित्त मंत्री बने उस समय देश के खजाने में महज 89 करोड़ डॉलर की विदेशी मुद्रा ही बची थी. इस करेंसी से महज दो हफ्ते का आयात का खर्च चल सकता था. ऐसे कठिन समय में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इन कठिन आर्थिक परिस्थितियों से निपटने के लिए डॉ मनमोहन सिंह को वित्त मंत्रालय सौंप दिया.

नरसिम्हा राव ने उन्हें इंदिरा गांधी के मुख्य सचिव रहे पीसी अलेक्जेंडर के कहने पर वित्त मंत्री बनाया गया था. वित्त मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने देश की इकोनॉमी को मजबूत बनाने के लिए कई कठोर कदम उठाए. उन्होंने भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू किया और मुश्किल में फंसी अर्थव्यवस्था को बाहर निकाला.
मनमोहन सिंह ने इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए क्या कदम उठाए?
मनमोहन सिंह ने इकोनॉमिक मामलों में सरकारी कंट्रोल को कम किया. इसके अलावा उन्होंने FDI को भी बढ़ावा दिया.उन्होंने देश की इकोनॉमी को ग्लोबल मार्केट के लिए खोल दिया गया. इतना ही नहीं उन्होंने देश में पहले से लागू लाइसेंस राज खत्म करने में अहम योगदान दिया. वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने मनरेगा जैसे अहम बदलाव किए.
उनके कार्यकाल के दौरान इमरजेंसी उपाय के तौर पर आरबीआई ने बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास सोना गिरवी रखकर 400 मिलियन डॉलर जुटाए. इसके बाद मनमोहन सिंह ने भारती की इकोनॉमी के सुधार के लिए एक सीरीज शुरू की, जिसके चलते वह देश को आर्थिक संकट से बाहर निकलने में सफल रहे.
गिरवी सोना छुड़वाया
वित्तीय संकट से गुजरने के लिए उन्होंने जुलाई 1991 के बजट में भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया गया. उनके इस फैसले का असर जल्द दिखाई देने लगा. जल्द ही भारत की विदेश मुद्रा में इजाफा होने लगा . इस बीच दिसंबर 1991 में भारत सरकार ने विदेशों में रखे गिरवी सोने को छुड़वाया और फिर से आरबीआई को सौंप दिया.
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