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झारखंड में कल्पना मुर्मू सोरेन का पदार्पण से झारखंड मुक्ति मोर्चा हुई मजबूत

ByBiru Gupta

Nov 27, 2024

 

झारखंड की राजनीति में हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं, जिनमें से कल्पना मुर्मू सोरेन का पदार्पण विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। कल्पना मुर्मू सोरेन, जो एक प्रमुख आदिवासी नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की सदस्या हैं, ने झारखंड की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। उनके आगमन ने जहां झामुमो को मजबूती प्रदान की है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आदिवासी चेहरे को भी ध्वस्त कर दिया है।

 

कल्पना मुर्मू का महत्व

 

कल्पना मुर्मू का नेतृत्व आदिवासी मुद्दों और अधिकारों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के कारण महत्वपूर्ण है। उन्होंने आदिवासी समुदाय की समस्याओं को उठाया और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनकी लोकप्रियता ने न केवल झामुमो को सशक्त किया, बल्कि आदिवासी समुदाय में विश्वास की भावना भी जगाई। जब से उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा है, तब से झामुमो की स्थिति में सुधार हुआ है। पार्टी ने आदिवासी मतदाता वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उनका प्रयोग किया, जिससे पार्टी की चुनावी संभावनाएं बढ़ी हैं।

 

झामुमो की मजबूती

 

कल्पना मुर्मू के पदार्पण के समय झामुमो ने अपने कार्यक्रमों और नीतियों में आदिवासी कल्याण को प्राथमिकता दी। उन्होंने आदिवासी भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। इसके परिणामस्वरूप, झामुमो ने आदिवासी मतदाताओं के बीच अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाया है। इससे लाभ उठाते हुए, झामुमो ने राज्य विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अद्भुत प्रदर्शन किया।

 

भाजपा का आदिवासी चेहरा ध्वस्त होना

 

भाजपा ने भी आदिवासी समुदाय में अपनी पैठ बनाने के लिए कई चेहरे पेश किए, लेकिन कल्पना मुर्मू के आगमन के बाद उनकी नीतियां और दावे कमजोर पड़ गए। भाजपा के आदिवासी चेहरे, जो पहले मजबूत लगते थे, अब निराधार प्रतीत होने लगे हैं। लोगों ने महसूस किया कि भाजपा की नीतियों में आदिवासियों के लिए कोई ठोस पहल नहीं है, जबकि झामुमो में ऐसे नेताओं की मौजूदगी है जो सच्ची निष्ठा के साथ इन मुद्दों को उठाते हैं।

 

निष्कर्ष

 

इस प्रकार, कल्पना मुर्मू सोरेन का झारखंड में पदार्पण न केवल झामुमो के लिए एक बड़ा अवसर था, बल्कि यह झारखंड की आदिवासी राजनीति में एक नया मोड़ भी था। उनकी नेतृत्व क्षमता और समाज के प्रति संवेदनशीलता ने झामुमो को मजबूती प्रदान की, जबकि भाजपा के आदिवासी चेहरे की धाराशायी स्थिति ने यह संकेत दिया कि आदिवासी समुदाय अब केवल शब्दों पर नहीं, बल्कि ठोस कार्यों और सिद्धांतों के आधार पर विचार कर रहा है। झारखंड की राजनीति में यह एक नई धारा है, जो आगे के दिनों में और भी महत्वपूर्ण बनती जाएगी।


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