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कुल्टी – महिलाए अपने पुत्रों को दीर्घायु लम्बी उम्र करने के उद्देश्य से पूरे विधि विधान से जितिया व्रत की।

Byadmin

Sep 14, 2025

 

रिपोर्ट सत्येन्द्र यादव

 

कुल्टी। जितिया व्रत की तीन कहानियां काफी प्रचलित है । जिसे महिलाए अपने पुत्रों को दीर्घायु करने के उद्देश्य से पूरे विधि विधान से व्रत करती है तथा अपनी परंपरा के अनुसार जो कथा उनके यहां पढ़ी जाती हो उसे पढ़ती या सुनती है । जिसमे पहली कथा सियारिन वाली है । दूसरी जीमूतवाहन राजा की और तीसरी भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है ।

कथा के अनुसार एक वन में सेमर के पेड़ पर एक चील रहती थी । पास की झाडी में एक सियारिन भी रहती थी । चिल्हो जो कुछ भी खाने को लेकर आती उसमें से सियारिन के लिए जरूर हिस्सा रखती । सियारिन भी चिल्हो का ऐसा ही ध्यान रखती । इस तरह दोनो मे काफी अच्छे संबंध थे । एक बार वन के पास की गांव में औरतें जिउतीया के पूजा की तैयारी कर रही थी । चिल्हो ने उसे बडे ध्यान से देखा और अपनी सखी सियारो को भी पूरी बात बताई । फिर चिल्हो-सियारो ने तय किया कि वे भी यह व्रत करेंगी । पुनः जब जिउतिया व्रत का समय आया तब सियारो और चिल्हो ने जिउतिया का व्रत रखा । बडी निष्ठा और लगन से दोनों दिनभर भूखे-प्यासे मंगल कामना करते हुए व्रत का पालन किया ।

परंतु रात होते ही सियारिन को भूख प्यास की तीव्र पीड़ा सताने लगी । जब उससे यह पीड़ा सहन नही हुआ तब उसने जंगल में जाके मांस और हड्डी लाकर पेट भरकर खाया । चिल्हो ने हड्डी चबाने के कड़-कड़ की आवाज सुनी तो पूछा कि यह कैसी आवाज है । सियारिन ने कह दिया- बहन भूख के मारे पेट गुड़गुड़ा रहा है यह उसी की आवाज है । मगर चिल्हो को पता चल गया । इसके बाद उसने सियारिन को खूब काफी कुछ कह दिया कि जब व्रत नहीं हो सकता तो संकल्प क्यों लिया था । सियारीन को अपनी गलती पर पछतावा हुआ । वही चिल्हो दिन रात भर भूखे प्यासे रहकर ब्रत पूरा की।

इसके बाद अगले जन्म में दोनों मनुष्य रूप में जन्म लेकर राजकुमारी बनकर सगी बहनें हुईं । सियारिन बड़ी बहन हुई और उसकी शादी एक राजकुमार से हुई । चिल्हो छोटी बहन हुई उसकी शादी उसी राज्य के मंत्रीपुत्र से हुई । बाद में दोनों राजा और मंत्री बने । सियारिन रानी के जो भी बच्चे होते वे मर जाते । जबकि चिल्हो के बच्चे स्वस्थ और हट्टे-कट्टे रहते । इससे उसे जलन होने लगा उसने कई बार उसने अपनी बहन के बच्चों और उसके पति को मारने का प्रयास भी किया पर सफल न हुई । आखिरकार दैव योग से उसे अपनी भूल का आभास हुआ ।

उसने क्षमा मांगी और बहन के बताने पर जीवित पुत्रिका व्रत विधि विधान से किया तो उसके पुत्र भी जीवित रहे । वही दूसरी कथा के अनुसार गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था । वे बडे उदार और परोपकारी थे । जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया । किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था । वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए । वन में ही जीमूतवाहन को मलयवती नामक राजकन्या से भेंट हुई और दोनों में प्रेम हो गया । एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी । पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया- मैं नागवंश की स्त्री हूं, मुझे एक ही पुत्र है । पक्षीराज गरुड़ के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है वे गरूड को प्रतिदिन भक्षण हेतु एक युवा नाग सौंपते हैं । आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है । आज मेरे पुत्र के जीवन पर संकट है और थोड़ी देर बाद ही मैं पुत्रविहीन हो जाउंगी । एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र न रहे ।

जीमूतवाहन को यह सुनकर बहुत दुख हुआ । उन्होंने उस वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा- डरो मत, मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा । आज उसके स्थान पर स्वयं मैं अपने आपको उसके लाल कपड़े में ढंककर वध्य-शिला पर लेटूंगा ताकि गरुड़ मुझे खा जाए और तुम्हारा पुत्र बच जाए । इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड़ को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए ।

अपने समय पर गरुड़ बड़े वेग से आए और वे लाल कपड़े में ढंके जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए । इसके बाद गरूड़ ने अपनी कठोर चोंच का प्रहार किया और जीमूतवाहन के शरीर से मांस का बड़ा हिस्सा नोच लिया । इसकी पीड़ा से जीमूतवाहन की आंखों से आंसू बह निकले और वह दर्द से कराहने लगे । अपने पंजे में जकड़े प्राणी की आंखों में से आंसू और मुंह से कराह सुनकर गरुड़ बडे आश्चर्य में पड़ गए । क्योंकि ऐसा पहले कभी न हुआ था । उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा । जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए वह अपने प्राण देने आए हैं । इसलिए आप मुझे खाकर अपनी भूख शांत करें । गरुड़ उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए । उन्हें स्वयं पर पछतावा होने लगा । वह सोचने लगे कि एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है और एक मैं हूं जो देवों के संरक्षण में हूं किंतू दूसरों की संतान की बलि ले रहा हूं । उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया । कथा अनुसार गरूड़ ने कहा- हे उत्तम मनुष्य में तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूं ।

मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूं । तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो । राजा जीमूतवाहन ने कहा कि हे पक्षीराज आप तो सर्वसमर्थ हैं । यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें ।आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें । जिसके बाद गरुड़ ने सबको जीवनदान दे दिया और नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया । इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई ।

तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई । यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं । महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की भावना सुलग रही थी । जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था । लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी । उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली ।

जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया । जिसे निष्फल करना नामुमकिन था । उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक था । जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया । गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बने ।

तब से ही इस व्रत को माताओं द्वारा किया जाता हैं । जिसको लेकर बराकर व आस पास के क्षेत्र से भारी संख्या मे मताए दोपहर बाद बराकर नदी तट पहुंच कर स्नान आदि करके निर्जला उपवास रहकर विधिवत जीवित पुत्रिका व्रत कथा सुनकर अपने पुत्रों की दीर्घायु होने की कामना की ।


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