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हॉलीवुड फिल्म “महायोगी:हाइवे 1 टू वननेस रिव्यू डॉ: सत्य प्रकाश गुप्ता

ByBiru Gupta

Dec 9, 2024

 

 

अध्यात्म क्या धर्म या मजहब से पृथक है ? अध्यात्म क्या योग या ध्यान से अलग है? धर्म की मौलिकता क्या अध्यात्म के दर्शनवादी दृष्टिकोण से अलग है ? क्या धर्म की सत्ता अध्यात्म के मूल्यों से परे है ? क्या अध्यात्म के बगैर समाज के सारे सरोकार संपूर्ण हो सकते हैं?।

 

देश को चलाने वाली नियामक पुस्तक संविधान में अध्यात्म के मूल्यों को समाहित किया गया है ? श्री राजन लूथरा निर्मित, निर्देशित फिल्म “महायोगी-हाइवे 1 टू वननेस” उपरोक्त प्रश्नों का उचित उत्तर अपने संवादों और दृश्यों से प्रक्षेपित करती है। कोई भी धर्म संवेदनविहीन नहीं हो सकता है। जो धर्म मानव समुदाय के दर्द,वेदना,समस्याओं का निदान करता है ,उस धर्म में वह अध्यात्म का मित्र बन जाता है। इसीलिए हमारा मुख्य चरित्र राज धर्म के उस मर्म की खोज में भौतिकवाद और बाजारवाद के मसीहा कहे जाने वाले देश अमेरिका से इंडिया आता है और अध्यात्म की लंबी सुरंग में प्रवेश कर महाभारत के कुरुक्षेत्र तक पहुंच जाता है ।

 

हजारों वर्ष पुराना साक्षी वृक्ष उस महामारक, मानव सभ्यता को निगल जाने वाला पांडव और कौरव के बीच का युद्ध का आंखों देखा हाल सुनाता है।अपने संभाषण में साक्षी वृक्ष राज को भेद खोल देता है कि हम हजारों वर्षों से तुम्हारी प्रतिक्षा करते आ रहे हैं और तुम अब आ गए हो ।तुम्हे विश्व मानव को एकात्म का मार्ग बताना है जो मुक्ति का मार्ग है।उस वननेस को पाने का एक ही मार्ग है और वो अध्यात्म और ध्यान है।अध्यात्म और ध्यान की गहराई में जाकर ही मनुष्य का प्रेम , वेदना, सिहरन और रुदन के दर्द का अनुभव होता है। राज को बेचऐन काऋणए वाले प्रश्नों का जवाब मिल जाता है जब साक्षी वृक्ष कहता है कि धर्म की पुस्तिका या मंदिर,मस्जिद,गिरजाघर या चर्च में जाकर मन में न प्रेम पैदा होता है और न शांति क्योंकि संवेदनशीलता, करुणा लेकर वह इन स्थलों पर नहीं जाता है। राज को उत्तर मिल जाता है, अध्यात्म का मौलिक आधार संवेदनशीलता है।धर्म की पद्धतियों में अध्यात्म या योग का संयोग बहुत आवश्यक है।

 

राज को अपने सारे प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है।अब वो खुश है कि धर्म की सत्ता में अध्यात्म का मूल भाव के बिना धर्म भी केवल धार्मिक स्थलों पर जाने या घर में भजन करने या धार्मिक पुस्तक पढ़ने से शांति और प्रेम हृदय में उत्पन्न नहीं होते हैं और धर्म एक बाजार जैसा लगने लगता है या लोग धर्म को इस्तेमाल करते हैं लेकिन उन्हें शांति नहीं मिलती है और न उनमें प्रेम और भाईचारा का उदय होता है। इसीलिए धर्म की साधना करने वाला व्यक्ति अध्यात्म को गहराई से अनुभव किए बगैर खुश नहीं रह सकता।चाहे उसके पास सबकुछ ही क्यों न हो?

 

राज की चेतना में अब आनंद की वर्षा हो रही है, वो अब

अनवरत भींग रहा है है।उसे लगता है कि मनुष्य को इस गहरे अवसाद से निकलने का मार्ग निकल आया है।समाज और राष्ट्र की पुस्तिका में मानव मन को समझने के लिए एक गहरी आंखे हैं जो अध्यात्म है, जो संवेदना है। मनुष्य या राष्ट्र युद्धों को हमेशा के लिए नकार देगा। इसीलिए जब राज कुरुक्षेत्र से हरिद्वार महादेव की शरण में आता है तो वह बहुत खुश है। मनुष्य और जानवर अध्यात्म और गहरी संवेदना के स्तर पर एक समान है। वह कुत्ता में कुछ देखता है और उसे चूमता है, गले लगाता है।देशों के बीच फैली हिंसा, युद्ध के खिलाफ इस एकात्म या वननेस को फैलाता है।राज का वननेस सभी नर नारी, बच्चे,बूढों को एक समान वैचारिक धरातल पर आने को आमंत्रित करता है जो। “वन पेज” पर लाने की बात करता है।

 

राज अमेरिका लौटता है तो लोगों के बीच वननेस को फैलाता है, सभी अध्यात्म के अदृश्य धागे से जुड़ जाते हैं। उनके दुख धीरे धीरे कम होने लगता है।

 

निर्देशक राजन लूथरा इस भौतिक वादी, खंडित भावनाओं में विभाजित मानवीय संसार को उल्लास, प्रेम और शांति में बदल देना चाहते हैं। तभी मनुष्यों में कर्तव्य बोध पैदा होगा। लोग ईमानदारी से कार्य करेंगे और देश और विश्व प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होंगे।

 

इस फिल्म में बहुत सारी मानवीय संवेदना को झकझोरने वाली घटनाएं हैं। राजनेताओं को भी एक पेज पर आने की उद्घोषणा की गई है। रजनीतो में इन पक्ष विपक्ष लोकतंत्र का आधार है लेकिन लोकतंत्र जीवित तभी रहेगा जब राजनीतिक नेताओं के बीच कटुता नहीं हो। इस फिल्म का सबसे मर्मान्तक दृश्य वो है जिसमें राज अमेरिकी सड़कों पर कुछ होमलेस लोगों के साथ चलते हैं।हाथ में बोर्ड है,तख्ती है जो अमरीका के अमीर लोगों से आह्वान करते हैं, उन्हें खरीद ले, उनके पास घर नहीं है, खाने पीने के लिए डॉलर नहीं है।

 

इस फिल्म में राज अपने व्यवसाय से परेशान हो अमेरिका के पहाड़ों, नदियों और धार्मिक स्थलों का भ्रमण करता।है लेकिन शांति नहीं मिलती है और अध्यात्म और दर्शन के देश भारत शांति की खोज में चला आता है ।

 

इस फिल्म का एक पी ओ वी(POV) है जो फिल्म में कहीं दिखाई नहीं देता है। राज किसी लड़की से फोन पर हमेशा बात करता है। शायद वो खुश हो कर अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियों को बताता रहता है या फिल्म के दूसरे भाग ये कैरेक्टर दिखाई देगा। फिल्म के एक दृश्य झकझोर देता है। दिल्ली में रेलवे ट्रैक के पास बसे गरीब परिवार की यातना का दृश्य सिहरन पैदा कर देता है। इनसे मुक्ति का एक मार्ग है सत्ता पक्ष और जनता को एक आध्यात्मिक पेज पर लाना। फिर तो रेलवे ट्रैक के पास बसे परिवार के बच्चे तेज भागती ट्रेन के शिकार नहीं होंगे। राज अमेरिका से इनको मदद भी भेजते रहते हैं।

 

 

फिल्म में बहुत सारे पात्र हैं जो अपनी भूमिका कई दृष्टियों से करते हैं,जैसे तकनीकी रूप से सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव कैमरा एंगल से पात्र एक्ट करते हैं तो कभी पी ओ वी से। इसीलिए फिल्म महायोगी हाइवे1 तो वननेस को एक फीचर फिल्म के साथ यूरोपीय भाषा में फिल्म के लिए दिया गया नाम ” Seventh Art and Tenth Muse” से पुकारा जा सकता है। अतः इस फिल्म को Docu -Drama भी बोल सकते हैं।

इस फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में सृजनात्मक स्तर मर सम्बद्ध रहा हूं।मुंबई की “पोस्ट हाउस” में इसका पोस्ट निर्माण का कार्य संपन्न हुआ। विजय वर्मा और निशांत सलिल की गहरी आध्यात्मिक संगीत ने फिल्म को जीवंत और आलोकित कर दिया है। डॉ. सत्यप्रकाश गुप्ता ने सृजनात्मक स्तर पर इस फिल्म में पोस्ट प्रोडक्शन का कार्य का निष्पादन तो किया है, श्री राजन लूथरा को लेखन में भी सहायता प्रदान की है ।साथ ही, पोस्ट प्रोडक्शन में कई जिम्मेदारियों को निभाया है।

 

फिल्म निर्माता राजन लूथरा इस फिल्म को अपने बैनर त्रिलोक फिल्म्स में निर्मित किया है। श्री राजन लूथरा ने कई चुनौतियां को एक साथ जिम्मेदारियों के साथ संपन्न किया। वे स्वयंम फिल्म की वैचारिक अवधारणा के सर्जक हैं। वे खुद निर्देशक,और फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले नायक की छवि के भी सर्जक हैं।

40 सालों से श्री राजन लूथरा अमेरिका में रह रहे हैं। उन्होंने करीब से भीड़ में खड़े अकेले आदमी को देखा होगा,महसूस किया होगा, परेशान होता देखा होगा और तभी इस तरह की कहानी की हाइपोथेसिस मन में जन्म लिया होगा और बाद में दिमाग में आया और अब सारी चीजें आप 13 दिसंबर ,2024 को फिल्म हॉल में देखेंगे। “महायोगी-हाईगवे 1 टू वननेस” एक अनोखी फिल्म है जो विरले ही बना पाते हैं। ये फिल्म धर्म, संप्रदाय से ऊपर एक मानव केंद्रित फिल्म है। आप जरूर इस फिल्म को जाकर देखे ओए दूसरों को भी अनुप्रेरित करें।


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