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सरायकेला :आजादी के 79 साल बाद भी अंधेरे में अयोध्या पहाड़ के पहाड़िया परिवार।  

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Aug 8, 2026
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सरायकेला : देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का 79वां साल मनाने जा रहा है, लेकिन पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिलेके अयोध्या पहाड़ की बीहड़ों में बसे आदिम जनजाति पहाड़िया समुदाय के लिए आजादी का मतलब आज भी सिर्फ एक शब्द है।

 

*बलरामपुर और बागमुंडी थाना क्षेत्र* के जंगल में छिटपुट रूप से बसे इन 4-5 परिवारों की जिंदगी आज भी जंगल पर ही निर्भर है।

 

*जंगल से कमाई, जंगल से ही गुजारा*

इन परिवारों के लोग पहाड़ की दुर्गम जगहों से सूखी लकड़ी, कांद-मूल, शाल पत्ता और दातून तोड़कर उतारते हैं और उसे बलरामपुर व बागमुंडी के बाजार में बेचते हैं। उसी थोड़ी-सी कमाई से घर का राशन आता है।

 

स्थानीय निवासी सुमित्रा पहाड़िया बताती हैं, “यहां न सड़क है, न बिजली, न स्वास्थ्य केंद्र। बीमार पड़ने पर कोई देखने वाला नहीं। गर्भवती को डिलीवरी के लिए खटिया पर लादकर 6-8 किलोमीटर जंगल का रास्ता पार कर सड़क तक लाना पड़ता है। तब कहीं जाकर गाड़ी मिलती है। दिन-रात एंबुलेंस भी इस जंगल में आने से कतराती है।”

 

*आजादी के बाद भी मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर*

2014 में बागमुंडी-1 के बड़गोड़ा गांव में एक प्राथमिक विद्यालय जरूर खुला, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं बदला।

– *पक्की सड़क नहीं* – कच्चे, ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना मुश्किल

– *शुद्ध पेयजल नहीं* – झरने का पानी पीने को मजबूर

 

– *आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र नहीं* – नजदीकी केंद्र 20-40 किमी दूर

– *पक्के मकान नहीं* – आज भी मिट्टी की दीवार और टीन के छप्पर में, जमीन पर सोते हैं

 

पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरकार योजनाएं चला रही है, लेकिन इन परिवारों के घर तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं है।

 

*घटती आबादी, बढ़ता पलायन*

अभाव के कारण इस आदिम समुदाय की आबादी लगातार घट रही है। कई पुरुष रोजगार के लिए राज्य से बाहर पलायन कर गए हैं।

 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इनमें से कई लोगों को यह भी नहीं पता कि 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाया जाता है। उनका पूरा जीवन जंगल और वन्यजीवों के बीच ही बीता है।

 

केंद्र सरकार आदिम जनजातियों के उत्थान के लिए तमाम योजनाएं चला रही है, लेकिन वह इन बीहड़ों तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं।

 

आजादी के इतने साल बाद भी अयोध्या पहाड़ के ये पहाड़िया परिवार विकास की मुख्यधारा से कटकर जंगल में ही सिमट कर रह गए हैं।


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