
सरायकेला। जिले में अवैध शराब के निर्माण, भंडारण और बिक्री पर रोक लगाने के लिए उत्पाद विभाग द्वारा लगातार छापेमारी अभियान चलाया जा रहा है। उपायुक्त सरायकेला-खरसावां के निर्देश पर उत्पाद अधीक्षक के नेतृत्व में मंगलवार को नीमडीह थाना क्षेत्र के बूढ़ीबासा एवं महतोडीह गांव में विशेष अभियान चलाया गया। गुप्त सूचना के आधार पर की गई कार्रवाई में उत्पाद विभाग की टीम ने दो अवैध महुआ चुलाई भट्टियों को ध्वस्त कर दिया।
छापेमारी के दौरान अधिकारियों ने लगभग 600 किलोग्राम जावा महुआ एवं 20 लीटर अवैध महुआ शराब बरामद की। साथ ही शराब निर्माण में उपयोग की जा रही अन्य सामग्रियों को भी जब्त कर नष्ट कर दिया गया। विभाग की ओर से बताया गया कि अवैध कारोबार में संलिप्त लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ झारखंड उत्पाद अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की गई है तथा मामले की जांच जारी है।
हालांकि, उत्पाद विभाग की इस कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर कई सवाल भी उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि विभाग पिछले कई दिनों से लगातार अवैध चुलाई भट्टियों को ध्वस्त करने का दावा कर रहा है, लेकिन इन अवैध कारोबारों को संचालित करने वाले मुख्य लोगों की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो पाई है। ऐसे में कार्रवाई की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर बार छापेमारी में केवल भट्टियां और शराब बनाने की सामग्री नष्ट की जाती है, जबकि कारोबारी मौके से फरार हो जाते हैं या उन्हें पकड़ने में विभाग विफल रहता है। इससे कुछ दिनों बाद फिर उसी क्षेत्र में अवैध शराब का कारोबार शुरू हो जाता है।
लोगों का मानना है कि जब तक संचालकों और नेटवर्क से जुड़े लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक इस तरह की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। वहीं जिला प्रशासन का कहना है कि अवैध शराब के कारोबार में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। प्रशासन ने स्पष्ट किया है
कि निर्माण, परिवहन, भंडारण और बिक्री में संलिप्त लोगों के खिलाफ लगातार अभियान जारी रहेगा तथा दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि अवैध शराब के निर्माण और बिक्री से संबंधित किसी भी सूचना को संबंधित विभाग तक पहुंचाएं, ताकि समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जा सके। फिलहाल उत्पाद विभाग की कार्रवाई जारी है, लेकिन लगातार हो रही छापेमारियों के बावजूद संचालकों की गिरफ्तारी नहीं होने से विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।
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