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वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव में 600 वर्ग फीट की ओरिगामी कलाकृति बनी आकर्षण का केंद्र

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Apr 25, 2026
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स्थानीय वीर कुंवर सिंह स्टेडियम, भोजपुर आरा में आयोजित वीर कुंवर सिंह विजयोत्सव समारोह में दिखा कला का भब्य व अदभुत नजारा। अवसर था विजयोत्सव,कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्रीमती अनुप्रिया जी का व्यापक व कलात्मक सोच ने इस ओरिगामी कला में भव्यता ला दिया।पुरे कार्यक्रम को संयोजित किया था श्रीमती अनुप्रिया जी ने।

600 वर्ग फीट में वीर कुंवर सिंह के भव्य व्यक्ति चित्र ओरिगामी शैली में, कोलाज का मिश्रित रूप इस कलाकृति में दिखा। भोजपुर जिले के वरिष्ठ व युवा कला शिक्षकों का सामूहिक प्रयास इस कलाकृति को राज्य के साथ देश के लिए भी खास बना दिया। भोजपुर जिले के कलाप्रेमियों ने जिसने कलाकृति को लाइव बनते देखा काफी नयापन लिए कलाकृति को तारिक करते नहीं थकते। कलाकृति को मूर्त रूप दिया चित्रकार राहुल कुमार,

मनीष कुमार, विवेक कुमार विश्वास ने तीनों कलाकारों का अथक परिश्रम से इस भव्य कलाकृति का धरातल तैयार हुआ,जो शहर के लिए बिल्कुल नया था। तीनों कलाकारों ने बारी – बारी से अपने संबोधन में कहा कि रचनाधर्मिता मन मस्तिष्क में पल रही सृजन क्षमता से उत्पन्न होती है।हम सभी वीर कुंवर सिंह को उनके साहस और बलिदान के लिए याद करते हैं,उसी सम्मान और याद में यह भव्य कला का निर्माण हुआ है,

निश्चित रूप से भोजपुर वासी इस कलाकृति को देखकर रोमांचित हो रहें हैं। कागज के छोटी-बड़ी टूकडों को छाया प्रकाश में परिवर्तित कर संयोजित करना आसान नहीं होता, लेकिन लोगों का आत्मविश्वास और कला एवं संस्कृति पदाधिकारी श्रीमती अनुप्रिया जी के भव्य कलात्मक समझ से यह संभव हो पाया।

कला शिक्षकों ने अपनी खासा प्रभावी समझ में व्यापकता दी है,जो कलाप्रेमियों को भीतर से उद्वेलित कर रहा है। चक्षु कला निश्चित रूप से लोगों को अपने एतिहासिक सांस्कृतिक के तरफ देखने के लिए प्रेरित कर रहा है। कुल मिलाकर यह कलाकृति स्टेडियम में आकर्षण का हिस्सा रहा। इस एतिहासिक पल के गवाह भोजपुर के कला प्रेमी ढेरों दर्शक बने जिसने इस कलाकृति को नया व प्रभावी बताया। विर कुंवर सिंह विजयोत्सव समारोह को सांस्कृतिक भव्यता मिल रहा था इस कलात्मक आकृति से तीन कलाकारों का सामूहिक प्रयास कलाकृति को शीर्ष बना दिया था। भोजपुर की धरती अपने मौलिक कलात्मक मूल्यों को लेकर हमेशा सजग रही है। इस एतिहासिक ओरिगामी व्यक्ति चित्र में कागज के भिन्न छाया प्रकाश को लयात्मक कलात्मक समझ के अनुसार ही जगह दिया गया था। तब हैं कि संस्कृति मूलक प्रभाव में भव्य कलाकृति अपने कलात्मकता को लेकर प्रतिबद्ध दिख रहा था,जो दर्शकों को रोमांचित करतें हुए अपने आकर्षण में लोगों को बांधे रखा।


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