

धनबाद : कोयलांचल की हृदयस्थली कहे जाने वाले झरिया की स्थिति इन दिनों बद से बदतर होती जा रही है। एक ओर जहाँ प्रकृति की प्रचंड गर्मी ने दस्तक दी है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं के अभाव में स्थानीय नागरिकों का जीना मुहाल हो गया है। प्रदूषण और विस्थापन के पुराने जख्मों के बीच अब बिजली और पानी की भारी किल्लत ने झरिया वासियों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है।

बिजली की किल्लत: 24 घंटे में सिर्फ 2-3 घंटे की आपूर्ति
झरिया में बिजली की स्थिति अब सामान्य कटौती से ऊपर उठकर एक गंभीर संकट का रूप ले चुकी है। आलम यह है कि पूरे दिन में बमुश्किल 2 से 3 घंटे ही बिजली मिल पा रही है। इस अनियमित आपूर्ति ने न केवल घरेलू जीवन को अस्त-व्यस्त किया है, बल्कि स्थानीय दुकानदारों और लघु उद्यमियों का व्यवसाय ठप होने की कगार पर है। भीषण गर्मी के बीच बिजली न होने से बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बाधित हो रही है। उमस और अंधेरे के कारण लोग चैन की नींद भी नहीं सो पा रहे हैं।
जल संकट: रतजगा करने को विवश नागरिक
बिजली के साथ-साथ पेयजल आपूर्ति विभाग की कार्यशैली ने भी लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। आपूर्ति का कोई निश्चित समय नहीं है; कभी देर रात पानी आता है तो कभी हफ्तों तक नल सूखे रहते हैं। अपनी प्यास बुझाने के लिए लोग रात भर जागने और सुबह दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
अर्धनग्न प्रदर्शन: आक्रोशित जनता ने सड़क पर फूंका शंखनाद
सोमवार को झरिया के सब्जी पट्टी क्षेत्र में आक्रोश का एक अनूठा और उग्र रूप देखने को मिला। बिजली विभाग की तानाशाही और लापरवाही के खिलाफ स्थानीय नागरिकों ने अर्धनग्न होकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि “विभागीय अधिकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि अब जनता का धैर्य जवाब दे चुका है। यह प्रदर्शन केवल शुरुआत है, अगर सुधार नहीं हुआ तो आंदोलन और उग्र होगा।” प्रदर्शनकारियों ने शंखनाद कर विभाग को चेतावनी दी कि यदि आपूर्ति में तत्काल सुधार नहीं हुआ, तो झरिया की जनता आर-पार की लड़ाई लड़ने से पीछे नहीं हटेगी।
सियासी सरगर्मी: सिर्फ आश्वासनों का दौर?
झरिया की इस बदहाली पर जनप्रतिनिधि भी सक्रिय नजर आ रहे हैं, लेकिन धरातल पर परिणाम शून्य हैं। सांसद ढुल्लू महतो और विधायक रागिनी सिंह लगातार विभागीय अधिकारियों को फोन पर फटकार लगा रहे हैं और सुधार के निर्देश दे रहे हैं। जनता का मानना है कि नेताओं की यह डांट-फटकार केवल कागजी या मौखिक खानापूर्ति बनकर रह गई है, क्योंकि बिजली और पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है।
झरिया की जनता आज दोहरे मोर्चे पर लड़ रही है—एक तरफ जानलेवा प्रदूषण और दूसरी तरफ प्रशासनिक विफलता। यदि समय रहते बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को सुचारू नहीं किया गया, तो झरिया में जन-आक्रोश का यह लावा किसी बड़े नागरिक आंदोलन का रूप ले सकता है।
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