
राज्य सरकार भले ही ‘अबुआ आवास’ और ‘सर्वजन पेंशन’ जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीट रही हो, लेकिन चांडिल प्रखंड के रुचाप पंचायत अंतर्गत गांगोडीह गांव की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। यहाँ एक बेबस विधवा, रेणुका मुंडायन, अपने दो मासूम बेटों (12 वर्षीय सुनील और 10 वर्षीय बलराम) के साथ एक ऐसे घर में रहने को मजबूर हैं, जिसे घर कहना भी शायद गलत होगा।

मौत के साये में गुजरती है रात:

रेणुका का आशियाना मिट्टी की दरकती दीवारों और टूटे हुए खपरैल के सहारे टिका एक खतरनाक ढांचा मात्र रह गया है। छप्पर को बांस की बल्लियों के सहारे किसी तरह गिरने से रोका गया है। बारिश हो या आंधी, हर पल इस परिवार को डर लगा रहता है कि कहीं यह जर्जर छत उनकी कब्र न बन जाए। पति सोमचांद सिंह मुंडा के निधन के तीन साल बाद भी रेणुका को किसी सरकारी आवास योजना का लाभ नहीं मिल सका है।
आर्थिक तंगी और भविष्य की चिंता:
आय का कोई जरिया न होने के कारण रेणुका दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह बच्चों का पेट पाल रही हैं। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा के लिए वह गांव छोड़कर शहर पलायन करने की सोच रही हैं। सवाल उठता है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि और पंचायत सेवक आतैयार करूँ?
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