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कोयलांचल का चुनावी दंगल: चिन्ह मिलते ही शुरू हुई ‘शह-मात’, क्या वादों की कसौटी पर खरे उतरेंगे प्रत्याशी?

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Feb 9, 2026

 

*विश्लेषण: चतुर्भुज कुमार, ‘अंतर्कथा’ ब्यूरो*

धनबाद नगर निगम का चुनावी परिदृश्य अब पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है। निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव चिन्हों (Symbols) के आवंटन ने इस मुकाबले को एक नई दिशा दे दी है। यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उस ‘शह-मात’ के खेल की शुरुआत है, जहाँ अगले कुछ दिनों तक शहर की राजनीति का पारा सातवें आसमान पर रहेगा।

 

चिन्हों का मनोविज्ञान और पहचान की चुनौती

 

नगर निगम जैसे स्थानीय चुनावों में चुनाव चिन्हों का महत्व विधानसभा या लोकसभा से कहीं अधिक होता है। यहाँ प्रत्याशी अक्सर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर व्यक्तिगत पहचान पर चुनाव लड़ते हैं।

 

विशेषकर निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए आवंटित चिन्ह ही उनकी पूरी ब्रांडिंग का आधार होता है। ‘अंतर्कथा’ की पड़ताल के अनुसार, चिन्ह मिलते ही प्रचार की रणनीति ‘चेहरे’ से हटकर ‘निशान’ पर केंद्रित हो गई है। मतदाताओं के बीच अपने चिन्ह को लोकप्रिय बनाना एक बड़ी मनोवैज्ञानिक चुनौती है, क्योंकि कम समय में इसे जन-जन तक पहुँचाना ही जीत की पहली सीढ़ी है।

 

प्रचार का दो ध्रुवीय मॉडल: डिजिटल बनाम पारंपरिक

 

इस बार धनबाद के चुनावी रण में प्रचार के दो अलग-अलग रूप देखने को मिल रहे हैं:

 

डिजिटल वॉरफेयर: युवा प्रत्याशी इंस्टाग्राम रील्स, फेसबुक लाइव और व्हाट्सएप ब्रॉडकास्ट के जरिए ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना दिखा रहे हैं। उनका लक्ष्य वह ‘फ्लोटिंग वोटर’ है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है।

 

जमीनी कनेक्ट: इसके विपरीत, अनुभवी प्रत्याशी पुराने ढर्रे यानी ‘डोर-टू-डोर’ संपर्क को प्राथमिकता दे रहे हैं। मोहल्लों की चौपालों और चाय की दुकानों पर होने वाली चर्चाएं आज भी बड़े वोट बैंक को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।

 

रिपोर्ट कार्ड बनाम वादे: जनता का मिजाज

 

इस बार के चुनाव में मतदाता ‘चुनावी लोकलुभावन’ वादों के बजाय प्रत्याशी के रिपोर्ट कार्ड को प्राथमिकता दे रहे हैं। ‘अंतर्कथा’ की टीम ने पाया कि जनता के बीच तीन मुख्य चिंताएं हैं:

 

बुनियादी ढांचा: वर्षों से लंबित ड्रेनेज (निकासी) की समस्या और मानसून में होने वाला जलजमाव इस बार निर्णायक मुद्दा है।

 

सुरक्षा और रोशनी: स्ट्रीट लाइट का अभाव केवल अंधेरे का मुद्दा नहीं, बल्कि सुरक्षा से जुड़ा विषय बन चुका है।

 

प्रतिनिधि की उपलब्धता: जनता अब ऐसे ‘पार्षद’ की तलाश में है जो पांच साल तक उनके बीच सुलभ (Accessible) रहे, न कि केवल चुनाव के समय दिखाई दे।

 

स्थानीय निकाय चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। धनबाद नगर निगम का यह चुनाव केवल सफाई या लाइट का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह इस शहर के भविष्य की कार्ययोजना तय करने का चुनाव है। प्रत्याशियों को चिन्ह तो मिल गए हैं, लेकिन ‘जनता का विश्वास’ वह सबसे बड़ा चिन्ह है जिसे हासिल करने की चुनौती अभी बाकी है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आएगी, यह संघर्ष और भी तीव्र होगा।


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