
सरायकेला: सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल अनुमंडल में दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की तराई में बसे आदिम जनजाति (सबर, खड़िया, पहाड़िया और बीहड़) के लोग गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। इन समुदायों की जीविका पूरी तरह से जंगल पर निर्भर है, लेकिन अब उनकी जमीन पर भू-माफियाओं और उद्योगपतियों की नजर है।

जंगल पर निर्भर है जीवन

ये समुदाय प्राचीन काल से ही इस क्षेत्र में रहते आए हैं। उनका जीवन जंगल के कंदमूल, फल-फूल और अन्य सामग्री पर टिका हुआ है। वे जंगल से सूखी लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ और दातुन बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं।
भू-माफियाओं का बढ़ता खतरा
टाटा-रांची मुख्य राजमार्ग-33 के सामने आदिम जनजातियों के पास मौजूद जमीन की कीमत करोड़ों में है। इन भू-माफियाओं और उद्योगपतियों द्वारा इन गरीब परिवारों को कानूनी मामलों में फंसाकर और प्रशासन का दबाव बनाकर उनकी जमीन हड़पने की कोशिश की जा रही है। एक तरफ सरकार इन्हें ‘वन पाठा’ देकर जंगल से बाहर बसाने का प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ भ्रष्ट नेता और माफिया मिलकर इनकी बची-खुची जमीन भी छीनने की कोशिश कर रहे हैं।
सरकार से मदद की अपील
सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि ये परिवार इतने गरीब हैं कि वे आयोग में जाकर भी अपनी आवाज नहीं उठा सकते। आज इन समुदायों की संख्या पहले की तुलना में बहुत कम हो गई है और वे विलुप्त होने की कगार पर हैं।
केंद्र और राज्य सरकारें इन समुदायों के संरक्षण के लिए विभिन्न योजनाएं चलाती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उनका लाभ इन तक नहीं पहुँच पा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता ने राज्य सरकार से इन परिवारों पर ध्यान देने और उनकी जमीन हड़पने की कोशिश करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की अपील की है, ताकि इन समुदायों को पलायन करने और विलुप्त होने से बचाया जा सके।
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