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ईचागढ़ विधानसभा में हाथियों की मौत का बढ़ता सिलसिला: विकास बनाम वन्यजीव संघर्ष और मिलीभगत के आरोप

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Byadmin

Jul 23, 2025

 

सरायकेला: झारखंड राज्य में मानव-हाथी संघर्ष एक गंभीर समस्या का रूप लेता जा रहा है, जिसका ताजा उदाहरण ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में हाथियों की लगातार मौतें हैं। हाल ही में झाड़ग्राम में ट्रेन से कटकर तीन हाथियों की मौत हुई थी, और उससे ठीक पहले ईचागढ़ विधानसभा में भी तीन हाथियों की अलग-अलग कारणों से मौत दर्ज की गई, जिनमें अंडा, हेवेन और तिल्ला गांव शामिल हैं।

 

हाथियों की मौत के विभिन्न कारण:

 

अंडा गांव: यहां एक हाथी की मौत कुएं में गिरने से हुई थी।

 

हेवेन गांव: इस गांव में एक हाथी की जान बिजली के तार की चपेट में आने से चली गई। विभाग ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए हेवेन गांव के ग्रामीण रघुनाथ सिंह पर एफआईआर भी दर्ज की है। ग्रामीणों को लगातार बिजली के तार न लगाने की चेतावनी भी दी जा रही है।

 

तिल्ला गांव: पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, तिल्ला में एक हाथी की मौत जहर देने से हुई थी।

 

हेवेन गांव की घटना के पीछे की कहानी:

 

हेवेन गांव में बिजली के तार से हाथी की मौत के मामले ने ग्रामीणों के “दुस्साहस” के पीछे के असली जिम्मेदार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। गहन जांच के दौरान सामने आया है कि हेवेन जंगल में पिछले साल बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई थी। इस जंगल के ठीक सामने लावा गोल्ड माइंस स्थित है, और इस माइंस के अधिकांश मजदूर इसी जंगल से होकर गुजरते हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार, हाथियों का आवागमन मार्ग (रूट डायवर्जन) चांडिल डैम जलाशय के ठीक सामने स्थित हेवेन जंगल में शिफ्ट हो गया था। लावा गोल्ड माइंस के मजदूरों ने अपनी यातायात सुविधा और हाथियों के “आतंक” से बचने के लिए पहले हेवेन जंगल में आग लगा दी। इसके बाद, जले हुए पेड़ों को “सूखे पेड़” बताकर उन्हें काट दिया गया, जिससे जंगल खत्म हो गया और उनका यातायात सुगम व सुरक्षित हो गया।

 

चांडिल डैम और एलिफेंट कॉरिडोर का अवरोध:

 

प्राचीन काल से यह जंगल हाथियों के आवागमन का मार्ग रहा है, लेकिन चांडिल डैम के बन जाने से एलिफेंट कॉरिडोर बाधित हो गया है। इसी वजह से हाथियों का ठहराव उसी जंगल के आसपास हो रहा है, जिससे ग्रामीण परेशान हैं और ऐसे “दुस्साहसिक कृत्य” को अंजाम दे रहे हैं।

 

लावा गोल्ड माइंस पर संरक्षण का आरोप:

 

इस पूरी स्थिति के पीछे लावा गोल्ड माइंस का संरक्षण साफ दिखाई देता है। आरोप है कि माइंस को इन ग्रामीणों के रूप में बिना किसी मानक सुरक्षा के न्यूनतम मजदूरी पर बीते कई सालों से श्रमिक उपलब्ध होते आ रहे हैं। आसपास के विस्थापित अपनी समस्या का असली कारण समझने में सक्षम नहीं हैं, और वे दिग्भ्रमित होकर ऐसे कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं।

 

विकास और पर्यावरण संतुलन पर सवाल:

 

यह घटना विकास की अंधी दौड़ पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जहां वन्यजीवों के अस्तित्व को खतरे में डाला जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन्य जीवों के अस्तित्व के बिना हमारा भी अस्तित्व अधूरा रह जाएगा, और हम इतिहास के एक अध्याय बनकर रह जाएंगे। सिंधु घाटी सभ्यता के पतन का उदाहरण देते हुए, यह बात कही गई है कि हमें इतिहास से सीखना चाहिए ताकि पहले हो चुकी गलतियों को दोहराया न जाए।

 

रिपोर्ट: विजय कुमार

 

 


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