
सरायकेला: चांडिल वन क्षेत्र के अधीन लुपुंगडीह पंचायत के बाना गांव में हाथियों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। लगातार दो दिनों से अर्जुन सिंह सरदार के घर पर ट्रस्कर हाथियों ने हमला किया, जिससे उनका परिवार बेघर हो गया है। ग्रामीणों ने अपनी जान-माल की सुरक्षा की मांग की है, लेकिन वन विभाग पर निष्क्रियता का आरोप लगाया जा रहा है।

लगातार दो रातों का हमला: घर तबाह, अनाज चट

18 जुलाई 2025 की देर रात करीब 1 बजे दो ट्रस्कर हाथियों ने अर्जुन सिंह के घर पर हमला कर मिट्टी की दीवारों को तोड़ दिया। घर में रखे लगभग डेढ़ क्विंटल चावल और एक क्विंटल धान को हाथियों ने अपना निवाला बना लिया। परिवार के लोग किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे।
शनिवार, 19 जुलाई की रात 11 बजे, दो ट्रस्कर हाथी फिर से अर्जुन सिंह के क्षतिग्रस्त घर पहुंचे। वे टूटे मकान के अंदर घुस गए और गेहूं की बोरियां उठाकर बाहर ले गए। अर्जुन सिंह भागकर दूसरे कमरे में पहुंचे, लेकिन हाथियों ने उस कमरे को भी तोड़ डाला और मानो अर्जुन सिंह को ढूंढने लगे। उन्होंने किसी तरह अपनी जान बचाई।
इसी रात, हाथियों ने शिवराम सिंह के घर का दरवाजा तोड़ दिया और देवब्रत सिंह के घर की दोनों तरफ की दीवारों को दांतों से छेद कर अंदर रखे धान और गेहूं को खाया।
वन विभाग पहुंचा, मुआवजे का आश्वासन, लेकिन ग्रामीणों में आक्रोश
आज चांडिल वन क्षेत्र के फॉरेस्टर राधा रमन ठाकुर, वनरक्षित राम चरण महतो और ईचागढ़ सब विट प्रभारी वशिष्ठ नारायण महतो बाना गांव पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर पूछताछ की और ट्रस्कर हाथी द्वारा हुई क्षतिपूर्ति के लिए मुआवजे का फॉर्म दिया। साथ ही, घायल अर्जुन सिंह के इलाज के लिए भी राशि आवंटित करने का आश्वासन दिया गया। ग्रामीणों ने वन विभाग पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न करने पर नाराजगी जताई और तत्काल जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। फॉरेस्टर ने आश्वासन दिया कि आज रात को एलिफेंट ड्राइव टीम द्वारा दोनों ट्रस्कर हाथियों को खदेड़ने का काम किया जाएगा।
मानवीय-हाथी संघर्ष का कारण और समाधान की मांग
वनरक्षित वशिष्ठ नारायण महतो ने इस मानव-हाथी संघर्ष के पीछे अयोध्या पहाड़ और दलमा सेंचुरी से सारंडा जंगल तक एलिफेंट कॉरिडोर में मानवीय बाधाओं को मुख्य कारण बताया। उन्होंने कहा कि 1984 में चांडिल बांध बहुउद्देशीय परियोजना डैम बनने के बाद अयोध्या से दलमा सेंचुरी तक हाथियों के माइग्रेशन में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न हुई, जिसका खामियाजा ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के लोग पिछले 40 वर्षों से भुगत रहे हैं।
झामुमो नेता विश्वरंजन महतो ने कहा कि हाथी ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र की आज एक बड़ी समस्या बन गए हैं। उन्होंने जंगल की कटाई, हाथियों के आवागमन के रास्ते में घरों और प्लांटों के निर्माण को इसका कारण बताया। उन्होंने यह भी कहा कि जंगल में पौष्टिक आहार की कमी के कारण हाथी गांव की ओर भटक रहे हैं।
झामुमो नेता ने आरोप लगाया कि अयोध्या पहाड़ में पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है और दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी चांडिल को इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने के बावजूद पर्यटकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे हाथी विचलित होकर भटक रहे हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि घरों की क्षतिपूर्ति के साथ-साथ जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और जल्द से जल्द मुआवजा राशि दी जाए। उन्होंने कहा कि धान की फसल तो फिर से उग सकती है, लेकिन मनुष्य की जान जाने के बाद उसका कोई मोल नहीं।
एक सूत्र के अनुसार, अयोध्या पहाड़ में वन्य जीवों के लिए उचित प्रबंधन देखा जा सकता है और स्थानीय ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना नहीं है। हालांकि, सरायकेला जिले में दलमा सेंचुरी हाथियों के लिए संरक्षित होते हुए भी हाथियों की कमी दिखती है और क्षेत्रीय ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना अक्सर देखने को मिलती है। इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और उद्योगपतियों में वन्य जीवों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव माना जा रहा है। उम्मीद है कि झारखंड सरकार प्राकृतिक संसाधनों के उचित प्रबंधन के साथ वन्य जीवों के सह-अस्तित्व की भावना के साथ कार्य करेगी।
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