
सरायकेला: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के सुवर्णरेखा नदी और दलमा जंगल से सटे प्राचीन कालीन जयदा बूढ़ा बाबा मंदिर में श्रावणी मेले की दूसरी सोमवार को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। इसे देखते हुए जिला प्रशासन ने मंदिर परिसर और नदी तट पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की है। चांडिल अनुमंडल पदाधिकारी के निर्देश पर स्थानीय रूप से प्रशिक्षित पांच लाइफ गार्ड गोताखोर और नावों की व्यवस्था की गई है, विशेषकर चांडिल डैम के रेडियल गेट खुले होने और नदी में जलस्तर बढ़ने के कारण किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए यह कदम उठाया गया है।

जयदा बूढ़ा बाबा मंदिर का गौरवशाली इतिहास:

मंदिर के महंत केशवानंद सरस्वती ने जयदा बूढ़ा बाबा मंदिर की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है और साल भर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। इस मंदिर का इतिहास 18वीं और 19वीं सदी के मध्यकालीन दिनों में केरा (खरसावां) महाराज और ईचागढ़ के राजा विक्रमादित्य देव से जुड़ा हुआ है।
महंत केशवानंद सरस्वती जी के अनुसार, पंचदशनाम जूना अखाड़ा मढ़ी-4 से आए जिन पर जयदा बूढ़ा की कृपा दृष्टि हुई, उन्हें स्वप्न मिला। इस प्रेरणा से केरा राजा ने 18वीं एवं 19वीं शताब्दी के मध्य में इस पहाड़ी पर आरवेट (अर्चना) की। श्री जयदेव सिंह ने ईचागढ़ के राजा विक्रमादित्य देव से जयदा स्थित बूढ़ा बाबा की इच्छा जाहिर की, जिसके बाद ईचागढ़ राजा की देख-रेख में जयदा मंदिर की स्थापना हुई।
कालांतर में, सन् 1966 में बाबा ब्रह्मानंद सरस्वती का आगमन हुआ। उनकी कठोर तपस्या और एकाग्रता से संतुष्ट होकर जयदा बूढ़ा बाबा ने मंदिर निर्माण का स्वप्नादेश दिया। कठोर परिश्रम और शिव भक्तों के सहयोग से सन् 1971 से मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो वर्तमान समय तक ब्रह्मालीन महंत ब्रह्मानंद सरस्वती के प्रयासों से जारी है। मंदिर के पूर्ण निर्माण के दौरान खुदाई में मिली प्राचीन पत्थर की मूर्तियां और शिलालेख से ज्ञात होता है कि यह मंदिर 9वीं एवं 13वीं शताब्दी में भोगुल्ल पुत्र दामप्प द्वारा बनवाया गया था।
स्वर्णरेखा नदी के तट पर स्थित यह पवित्र जयदा बूढ़ा बाबा का मंदिर भक्त-वत्सल्य है। यहां स्वयं कैलाशपति बूढ़ा बाबा के रूप में भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
यह मंदिर टाटा-रांची मुख्य राज्य मार्ग NH 33 से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जमशेदपुर से 35 किलोमीटर, रांची से 100 किलोमीटर और पुरुलिया से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह देवों के देव महादेव का धाम भक्तों को अपनी ओर खींचता है।
सुरक्षा व्यवस्था और भक्तों से अपील:
श्रावण मास 2025 के अवसर पर जयदा शिव मंदिर में कांवड़ियों और श्रद्धालुओं द्वारा जलार्पण किए जाने की उम्मीद है, विशेषकर प्रत्येक सोमवार को अत्यधिक भीड़ होने की संभावना है। वर्तमान में लगातार हो रही वर्षा और चांडिल डैम के 10 रेडियल गेट खुले होने से नदी में पानी का बहाव अत्यधिक है। मंदिर के पास जल भरने के लिए एक ही स्थान (मंदिर के पास सीढ़ी) है, और नदी का पानी कुछ सीढ़ियों को डुबो चुका है, जिससे पानी गहरा बताया जा रहा है। जिला प्रशासन ने संभावित दुर्घटनाओं से बचने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की है और भक्तों से सावधानी बरतने की अपील की है।
जयदा मंदिर परिसर के अलावा, दलमा सेंचुरी के अंदर दलमा बूढ़ा बाबा मंदिर (35 किलोमीटर) और पुरुलिया जिला के बड़ेदा शिव मंदिर (42 किलोमीटर) तथा तमाड़ क्षेत्र के एक प्राचीन कालीन शिव मंदिर में भी भक्त और कांवड़िये जलाभिषेक करने जाते हैं। जिला प्रशासन द्वारा जयदा मंदिर परिसर में सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने से किसी भी दुर्घटना की संभावना नहीं है।
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